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Sunday, May 1, 2011

प्रेम अंकल इंटरनेट और वर्ल्ड कप

प्रेम अंकल इंटरनेट और वर्ल्ड कप
संस्मरण – प्रेमचंद सहजवाला
प्रेम अंकल ने जब पहली बार इन्टरनेट के बारे में पत्रिकाओं में पढ़ा तब बेहद प्रसन्न हुए. उन्हें सब से ज्यादा तो यही चीज़ भाई कि यदि हम अमरीका में कोई पत्र डाक के रस्ते भेजें तो उसे वहाँ पहुँचने में पंद्रह से बीस दिन तक आसानी से लग सकते हैं, पर यदि वही पत्र इन्टरनेट द्वारा भेजें तो उसे पहुँचने में एक मिनट से भी कम समय लगेगा! पर जब इन्टरनेट सचमुच अंकल के ऑफिस में आ गया तो वे चकित थे कि केवल पत्र यानी ई मेल भेजना तो मामूली सी बात है और कि किसी भी परिचित या अपरिचित से गपशप यानी चैट करना भी बहुत मामूली सी बात... ये सब तो इंटरनेट की ऐसी सेवाएं हैं जैसे खाने के साथ चटनी वटनी होती है. इंटरनेट पर तो पूरा का पूरा अखबार भी पढ़ा जा सकता है, सिर्फ भारत का नहीं, अमरीका का ‘वाशिंगटन पोस्ट’ भी तो पाकिस्तान का ‘द डॉन’ भी और कई अन्य. प्रेम अंकल अब एक साथ कई अखबार इंटरनेट पर पढ़ने लगे. सब से पहले तो उन्होंने एक्सप्रेसइण्डिया.कॉम खोला और वहाँ कभी कभी बड़े बड़े लोगों से चैट भी करते. कभी बिशन सिंह बेदी से तो कभी जसवंत सिंह या वाजपेयी से और कभी भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अशरफ जहाँगीर काज़ी तक से! उनके चैट पर पूछे गए प्रश्न उत्तरों समेत अखबार में छपते और वे चकित होते कि जो कुछ पहले पत्र पत्रिकाओं में संभव था वह अब तत्क्षण इंटरनेट पर भी संभव है. वैसे मज़ेदार बात यह भी अंकल अभी सारी शब्दावली नहीं सीख पाए थे. उदहारण के तौर पर फुर्सत के क्षणों में वे एक बार चैटिंग पर बैठे तो कैनाडा में बैठी एक अजनबी युवती गुज्जूगर्ल ने उन से पूछा – ए.एस.एल? अंकल समझे लड़की पूछ रही है कि क्या आप आसनसोल से हैं? उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, मैं आसनसोल से नहीं हूँ, मैं तो दिल्ली में रहता हूँ. फिर गुज्जूगर्ल से वे पूछने लगे कि आपका नाम गुज्जूगर्ल क्यों है? तब उस लड़की ने बताया कि उसका नाम तो जूली पटेल है पर वह क्योंकि गुजरात से है सो उसने अपना चैट नाम रख दिया है गुज्जूगर्ल! तब अंकल ने भी क्या किया कि अपना चैट नाम रख दिया बुद्धू! पर जूली पटेल अंकल से कहती कि आप बुद्धू लगते ही नहीं हो! आप तो इतना कुछ जानते हो! पर एक दिन मज़ेदार बात यह हुई कि जूली पटेल यानी गुज्जूगर्ल अंकल से चैट करती करती बोली – बी.आर.बी. बुद्धू समझा ही नहीं. काफी देर गुज्जूगर्ल गायब रही पर जब लौटी तो बेचैन से प्रेम अंकल ने उस से पूछा – ‘बी.आर.बी का मतलब?’ गुज्जूगर्ल बोली – ‘अंकल बी.आर.बी का मतलब मैं अभी आई. बी राईट बैक!’ तब अंकल ने गुज्जूगर्ल से यह भी पूछा कि पहले दिन उसने यह क्यों पूछा था कि क्या मैं आसनसोल से हूँ? इस पर गुज्जूगार्ल ने अपना कहकहा टाईप कर दिया – हा हा हा हा. ए.एस.एल था वह, इस का मतलब आप कितने साल के हो, नारी हो या पुरुष. आप कहाँ से चैट कर रहे हो? अब एक दिन गुज्जूगर्ल बात करते करते अंकल से बोली – ‘जस्ट वेट, आइ ऐम सेटिंग माई लैपटॉप.’ अंकल ने समझा गुज्जूगर्ल की गोद में कोई बच्चा है सो बोले – ‘इज़ यूअर बेबी सिटिंग ऑन यूअर लैप? ओके, पुट हिम इन बेड.’ गुज्जूगर्ल को बहुत गुस्सा आया, बोली – अब तो लगता है आप सचमुच बुद्धू हो अंकल. लैपटॉप तो कम्प्यूटर को ही कहते हैं जो एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.’ बहरहाल, अंकल को अब नेट के इस्तेमाल में खूब मज़ा आया. देखते देखते एक दिन वे यहाँ तक पहुंच गए कि अपना एक क्रेडिट कार्ड का बिल भी अंकल ने नेट पर भर दिया! बिल्कुल ही नहीं डरे! दरअसल अंकल के बेटे ने भी उन्हें बहुत कुछ समझा दिया था और गुज्जू ने भी. अब अंकल काफी एक्सपर्ट हो गए. अब उनके लिए सपत्नीक मुंबई अपनी ससुराल जाने के लिए आरक्षण करवाने के लिए घंटों लंबी लाइन में खड़े होने के दिन लद गए. अब वे अपनी गाड़ियों के और हवाई उड़ानों के आरक्षण भी नेट पर कराने लगे और उन्हें लगा कि नेट तो उस जादुई कालीन की तरह है जिस पर बैठ कर कोई भी व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में आधे मिनट में ही पहुँच सकता है. शायद दुनिया के सब बड़े बड़े व्यापार भी अब तेज़ी तेज़ी से इंटरनेट पर होते होंगे. पर अंकल को लगा कि नेट पर बड़ी होशियारी भी ज़रूरी है शायद. पर फिर भी अंकल ने अब अपने बिजली के बिल, टेलीफोन के बिल, मोबाईल के बिल और यहाँ तक कि हाऊस टैक्स और सिनेमा के टिकट के पैसे तक नेट पर भरने शुरू कर दिए थे और उन्हें अज़खुद खुशी होती थी. अब अंकल की नेट यात्रा और भी मज़ेदार सी होने लगी थी. जब कॉमनवेल्थ गेम्स आए तो अंकल को बेचैनी सी हुई कि ये गेम्स सपत्नीक आखिर कैसे देखे जाएं. अंकल ने गूगल में टाईप कर दिया ‘कॉमनवेल्थ गेम्स टिकेट्स और गेम्स का वेबसाईट पता चल गया. अंकल ने धडाधड एक तो स्व्मिंग के और एक एथलीट्स के दो दो टिकट बुक करा दिए फिर बेसब्री से इंतज़ार करने लगे टिकटों के कोरियर का. बहुत बेसब्री के इंतज़ार के बाद गेम्स शुरू होने से एक दिन पहले दोनों खेलों के टिकटों के कोरियर आ गए. अंकल बेहद खुश थे. आंटी के साथ हो आए. स्टेडियम के बाहर से सीट तक पहुँचने की लंबी लाइन और लंबा फासला उन्हें महसूस ही नहीं हुआ. पर जब अंकल ने वर्ल्ड कप के टिकट बुक कराये तो बुरे फंसे. अब की बार उन्हें पता चला कि नौ मार्च को दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला में हो रहा है भारत का मुकाबला नेदरलैंड्स से! भला यह मौका वे कैसे चूक सकते थे अंकल! उन्होंने तो कट् कट् कट् कट् कर के आँखें मूँद कर दो टिकट बुक करा दिए. पत्नी को उन्होंने बताया कि तीन तीन सौ के हिसाब से दो टिकट के छः सौ रूपए और सौ रूपए कोरियर के कर के उन्होंने आठ सौ रूपए भर दिए हैं! पत्नी भी खुश हो गई पर अंकल बेसब्री से इंतज़ार करते ही रह गए. टिकट का कोरियर आया ही नहीं और मैच का दिन भी आ गया. अंकल ने पिछली रात देर तक बैंगलोर पूना दिल्ली वगैरह के बहुत से फोन मिलाए पर सब जगह से यही जवाब मिला कि जो नंबर आप टिकेट के साईट क्याजूँगा.कॉम से प्राप्त हुए एस.एम.एस से पढ़ कर बता रहे हैं वह नंबर उनके कम्प्यूटर में है ही नहीं! ठीक नौ मार्च सुबह सुबह बेटे ने उनसे कहा कि क्याजूँगा.कॉम का ऑफिस तो लोदी रोड पर ही साईं बाबा मंदिर के साथ कोठी नं. 13 में है, वहीं जा कर क्यों नहीं पता करते? और अंकल सुबह सुबह नौ बजे ही पहुँच गए क्याजूँगा के ऑफिस और वहाँ खूब ताव में आ कर पूछने लगे कि उनके टिकट गए कहाँ. एक लड़की ने उन्हें चैन से बिठाया कि अंकल वो एस.एम.एस दिखाओ आप. मैं चेक करती हूँ. लड़की ने तुरंत अपने लैपटॉप में एस.एम.एस में दर्ज नंबर टटोला तो लैपटॉप का ही स्क्रीन अंकल की तरफ करती बोली – ‘अंकल आपने टिकट के पैसे भरे कहाँ हैं? टिकट तो पांच सौ पचहत्तर रूपए का एक है? जबकि आपने टिकटों की बजाय उन सीटियों पर क्लिक कर दिया हैं जो दर्शक गण मैच देखते देखते बजाते हैं. ये लीजिए,’ और वह लड़की उस नंबर के मुताबिक अंदर से एक छोटा सा बॉक्स ले आई. उस लड़की ने ही फिर खोल कर अंकल को दिखा दिया कि देखिये, ये हैं टिकेट, इन्हें ऐसे गर्दन के गिर्द हार की तरह पहनते हैं!
अंकल के घर का नज़ारा खूब मज़ेदार था. बेटा तो ऑफिस जा चुका था पर ढाई बजे जब मैच शुरू हुआ तो अंकल आंटी टी.वी के सामने कुर्सियां डाल और वे सीटियाँ हार की तरह अपनी गर्दनों में पहन कर बैठ गए. जब भी नेदरलैंड का कोई खिलाड़ी आऊट होता या भारत की पारी में भारत की तरफ से कोई सिक्सर या बाऊंड्री वाऊंद्री लगते तो दोनों ज़ोर ज़ोर से सीटियाँ बजने लगता और एक दूसरे की तरफ देख खूब हँसते. वह दिन याद कर के और कभी कभी वे सीटियाँ निकाल कर आज भी अंकल को इन्टरनेट पर की हुई अपनी भूल पर खुद पर ही खूब हंसी आ जाती है!

Saturday, March 12, 2011

कन्हैयालाल नंदन – एक रोचक प्रसंग


कन्हैयालाल नंदन – एक रोचक प्रसंग
प्रेमचंद सहजवाला
दि. 25 सितम्बर 2010 की दुखद प्रातः हिंदी पत्रकारिता व साहित्य जगत के एक सशक्त हस्ताक्षर कन्हैयालाल नंदन नहीं रहे. उन्हें ले कर मेरी भी कुछ व्यक्तिगत स्मृतियाँ हैं, जिन में से एक रोचक प्रसंग मैं पाठक से बांटने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा. सन् 70-80 के दशक में मैं कहानी लेखन में खूब सक्रिय था. उस दशक में मेरी तैनाती लगभर चार वर्ष सोनीपत में भी रही और मैं हर सप्ताह दिल्ली अपने माता पिता व भाई बहनों से मिलने भी आता रहता. दिल्ली के साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्रायः प्राप्त होता और कहानी लेखन को ले कर कई वरिष्ठ साहित्यकारों से चर्चा परिचर्चा भी होती रहती.
दिल्ली में जिन सुपरिचित कथाकारों से मैं व्यक्तिगत रूप से परिचित था, उनमें कथाकार मणिका मोहिनी भी थी जो साऊथ पटेल नगर में रहती थी. उनके निवास पर कई साहित्यिक सरगर्मियां चलती रहती जिन में डॉ. रामदरस मिश्र, डॉ. महीप सिंह डॉ. नरेंद्र मोहन आदि भी अक्सर आते रहते. सोनीपत से मणिका मोहिनी जी से सहित्य चर्चा पत्र-व्यवहार द्वारा भी अक्सर चलती रहती. एक दिन मणिका मोहिनी का पत्र आया कि उनकी एक कहानी ‘सारिका’ में छपने वाली है और कि नंदन जी का पत्र उन्हें कल ही मिला है. शायद अगले अंक में छप जाए. नंदन जी तब ‘सारिका’ में नए संपादक बने थे क्यों कि कुछ अरसा पूर्व ‘सारिका’ कार्यालय मुंबई से शिफ्ट हो कर दिल्ली आ गया था.
उन दिनों सोनीपत जैसे छोटे स्टेशन पर पत्रिकाओं की प्रतीक्षा मैं बेताबी से करता था. स्टेशन की आधी छत वाले प्लेटफोर्म में प्रवेश करते ही बाईं तरफ एक पत्रिका स्टाल था जिसे एक वृद्ध व्यक्ति चलाता था. हाथ कांपते थे और बोलते समय आवाज़ भी. मैं एक दिन रात आठ बजे के लगभग इस स्टाल पर पहुंचा और पूछा – ‘सारिका’ आ गई? ‘धर्मयुग’ आ गया’?
वृद्ध बोला – ‘अभी जो गाड़ी आएगी, उस में से शायद कुछ पत्रिकाएँ बाहर प्लेटफोर्म पर फेंकी जाएँ. एकदम इंजन के पीछे वाले डिब्बे से’. मैं तत्परता से वहाँ तैनात हो गया जहाँ इंजन के होने की सम्भावना थी और कुछ ही देर बाद गाड़ी आई तो उस में से सचमुच, कैलेण्डर की तरह रोल किये पांच सात पत्रिकाओं के बण्डल फेंके गए और गाड़ी चली गई. मैंने झुक कर उस सरे बण्डल समूह को अपनी गोद में उठा लिया और तेज़ तेज़ भागता हुआ पत्रिका स्टाल तक पहुंचा. हांफता हुआ बोला – ‘ये लो, ‘सारिका’ भी आ गई, ‘धर्मयुग’ भी’. पत्रिका स्टाल का जो छोकरा पत्रिकाएँ समेटने प्लेटफोर्म पर घूमता है, वह खाली हाथ लौटा तो बुड्ढा मुस्करा कर बोला – ‘इन्होने ले ली. रोज़ आते रहते हैं’.
बहरहाल, मैं ‘सारिका’ और ‘धर्मयुग’ खरीद कर अपने कमरे में पहुंचा और सब से पहले यह काम किया कि ‘सारिका’ में मणिका मोहिनी की कहानी खोज कर पढ़ डाली. तब अकेला ही रहता था और शादी नहीं हुई थी. अगले दिन सुबह एक ‘इनलैंड लैटर’ पर मणिका जी को पत्र लिखने बैठ गया. मैंने लिखा – ‘मणिका जी, सच पूछें तो मुझे आपकी यह कहानी बिलकुल पसंद नहीं आई. एकदम बीस साल पुरानी सी कहानी लगी. इतनी पुरानी मानसिकता वाली कहानी की उमीद कम से कम आप से नहीं थी’. आगे कहानी संबंधी कुछ और बातें लिख कर मैंने वह ‘इनलैंड लैटर’ पोस्ट कर दिया. इस के बीसेक दिन बाद सारिका का अगला अंक आया तो मैं हैरान था. उस अंक के पाठकीय पत्रों में एक पत्र का शीर्षक था ‘बीस साल पुरानी कहानी’. मैं फ़ौरन सारा पत्र पढ़ गया. नीचे मेरा ही नाम लिखा था. मैं चकित था. कहीं मैंने वह पत्र मणिका मोहिनी की जगह गलती से ‘सारिका’ में तो नहीं भेज दिया था? पर ठीक तीसरे दिन दिल्ली गया तो घर में मणिका जी का फोन आया – ‘दिल्ली आए हो तो मुझ से मिल कर जाना. एक मज़ेदार बात बताऊंगी’. मैं शाम को ही उनके घर गया और बैठते ही उस पत्र का ज़िक्र छेड़ दिया. मणिका जी हंस कर बोली – ‘बैठो. इत्मीनान से ‘ब्लैक टी’ पियो. बताती हूँ’. फिर वे बोली – ‘पिछले हफ्ते नंदन जी यहाँ आए थे’. मणिका जी के निवास पर उन दिनों खूब साहित्यिक सरगर्मियों के अलावा कभी कभी कुछ लेखक व्यक्तिगत भेंट करने भी चले जाते और वहाँ बढ़िया कॉफी या ‘ब्लैक टी’ पी कर आते. मणिका जी बोली – ‘नंदन जी ने आते ही मेरी कहानी का ज़िक्र छेड़ा और बोले, क्या कुछ पाठकों ने तुम्हें प्रतिक्रियाएं भेजी? कुछ पत्र आए?’ मैंने उनकी तरफ सात आठ पत्र बढ़ा दिए कि इन सब ने मुझे कहानी पर बधाई दी है. सब ने मेरी तारीफ़ की है’ पर नंदन जी बोले –‘क्या किसी ने विरोध भी किया? किसी ने आलोचना की तुम्हारी कहानी की?’ तब मैंने आपका ‘इनलैंड लेटर’ बढ़ा दिया और बोली – ‘यह सोनीपत से प्रेमचंद सहजवाला का है. उन्हें मेरी कहानी पसंद नहीं आई’ नंदन जी ने फ़ौरन आपका पत्र पढ़ा और अपनी पॉकेट के हवाले कर दिया. बस, यह ताज़ा अंक देखूं तो आपका पत्र छपा है’. मैं सब समझ गया. मणिका जी बोली – ‘नंदन जी कह रहे थे, लेखक को केवल अपनी प्रशंसा सुनने का लोभ नहीं होना चाहिए. पाठकों की कटु प्रतिक्रियाएं भी काम आती हैं’. तब सचमुच बड़ी सख्ती वाले दिन थे. कोई कोई पाठक प्रेम कहानी पढ़ कर पेटी बुर्जुआ कह देता था या लिख देता था कि आप की नसों में तो नपुंसकता भरी है, अच्छी कहानी आखिर कैसे लिखेंगे. कईयों का तात्पर्य मार्क्सवादी कहानी या क्रांति वाली विद्रोही कहानी से होता.
मैंने मणिका जी से कहा - ‘पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी और संपादकों की झिड़कियां भी’.
इस पर मणिका जी को कोई प्रसंग याद आया और वे खूब हंस पड़ी. बोली – ‘आप को शीला झुनझुनवाला ने क्या झिड़की दी थी?’ मैं खूब शर्माया, पर बोला – ‘मुझ से शीला झुनझुनवाला बोली थी – ‘आप साहित्यकार हो या कपड़ा बेचने वाले. यहाँ क्यों नज़र आते हो?’ (यानी ‘हिन्दुस्तान टाईम्स बिल्डिंग में). तब हिमांशु जी उनसे बोले थे – ‘ये कभी कभी मुझ से मिलने आते हैं’.
मैंने कहा – ‘मणिका जी, शीला झुनझुनवाला ने इसके बावजूद हिमांशु द्वारा स्वीकृत कर के आगे बढ़ाई मेरी तीन तीन कहानियां छापी हैं’.
मणिका जी मुझे तसल्ली देती बोली – ‘इत्मीनान रखो. अब उन्हें यकीन हो गया है कि तुम कपड़ा बेचने वाले नहीं हो , साहित्यकार हो साहित्यकार. मैं अगले दिन ‘सारिका कार्यालय’, जो 10 दरियागंज में था की तरफ यूं ही कुछ लोगों से भेंट करने चला गया तो नंदन जी बाहर सड़क पर एक सफ़ेद कार में तेज़ी से प्रवेश कर रहे थे. मैंने नमस्कार किया तो बोले – आपकी चिट्ठी छाप दी है भाई और आपके संग्रह की समीक्षा अगले अंक तक आ जाएगी. अब चलता हूँ, ज़रा जल्दी में हूँ’. पर नंदन जी द्वारा छापी गई मेरी चिट्ठी को ले कर सोनीपत में एक रोचक सा प्रसंग भी चल पड़ा था. एक कोई प्रोफेसर बत्रा था (नाम परिवर्तित है). उन्होंने हाल ही में कहानियां लिखी शुरू की थी. वे मेरे पीछे पड़ गए कि मेरी कहानी के साथ तुम नंदन जी के नाम एक चिट्ठी लिख दो कि बत्रा मेरे दोस्त हैं, आप उनकी कहानी ज़रूर छापें. यह बात वहाँ की ‘लिटरेरी सोसाइटी’ के अध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र गोयल के घर हो रही थी. शैलेन्द्र गोयल फ़ौरन बत्रा से बोले – ‘ऐसा जोखिम कभी न उठाना. नंदन जी इनकी चिट्ठी छाप देंगे और आपकी कहानी लौट आएगी’. बहरहाल, प्रो. बत्रा तो बाद मंम अच्छा लिखने लगे और अपने बलबूते पर उनका काफी कुछ छपा पर नंदन जी ने जो मणिका जी से कहा कि ‘लेखक को केवल अपनी प्रशंसा सुनने का लोभ नहीं होना चाहिए. पाठकों की कटु प्रतिक्रियाएं भी काम आती हैं’, मेरे लिये एक इतने बड़े साहित्यकार से मिला हुआ एक महत्वपूर्ण पाठ हो गया, जो मुझे आज तक याद है, और जब तक मेरी कलम चलेगी तब तक याद रहेगा.

Thursday, February 10, 2011

सितम फेसबुक के ..

सितम फेसबुक के
प्रेमचंद सहजवाला
फेसबुक से ज्यादा शायद इन्टरनेट का कोई भी लिंक प्रसिद्ध नहीं हुआ होगा. पर जहाँ एक तरफ फेसबुक से ही मुझे संदेश आते हैं कि फेसबुक के सदस्यों की संख्या अगण्य सी हो गयी है, इसलिए अब यह देखा जाएगा कि कौन फेसबुक को कितना इस्तेमाल करता है और बहुत कम इस्तेमाल वालों को बहिष्कृत कर दिया जाएगा, वहीं दूसरी ओर कभी कभी ऐसी ऐसी मुसीबतें भी खड़ी हो जाती हैं जिन से बहुत मुश्किल से निवारण हो पाता है. कुछ महीने पहले मेरे साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही हुआ था.
फेसबुक पर मैंने खूब मित्र बनाए. लेखक हूँ सो कोई भी परिचित अपरिचित लेखक मित्रता का निवेदन भेजता तो मैं स्वीकार कर लेता और कइयों को मैंने भी निवेदन किये तो स्वीकार हो गए. अशोक चक्रधर, आलोक तोमर धीरेन्द्र अस्थाना उदय प्रकाश तक जैसी हस्तियाँ जिसकी फेसबुक मित्र हों भला उसे आखिर क्या चाहिए फेसबुक से? प्रसन्नता तो इस बात की भी कि अब तो महिलाऐं भी बहन जी या भाई साहेब के संबोधन का बंधन नहीं डालती वरन् एक से बढ़ कर एक प्रबुद्ध महिलाऐं भी मेरी फेसबुक मित्र हैं, यथा सुधा अरोड़ा, नेहा शरद, भला इस से ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती थी?.
पर एक दिन क्या होता है कि मुझे एक महिला शायरा जिस की कई गज़लें पढ़ कर मैंने उन पर सुंदर सुंदर टिप्पिणियाँ की थी, की ओर से एक फेसबुक संदेश मुझे मिलता है – ‘मैंने आप को देख लिया है, आप वीडियो में दाईं ओर हैं.’ मैं चकित था. न जाने कितनी बार पत्रों पत्रिकाओं में तसवीरें छपीं और अब यह वीडियो भी देख लेता हूँ. कहाँ हूँ मैं? उस संदेश के साथ नीले अक्षरों में जो लिंक था, मैंने उसे बस क्लिक किया और मुसीबत शुरू. फ़ौरन मेरे कम्प्यूटर पर एक वाइरस का आक्रमण हो गया और कम्प्यूटर पर असंख्य चेतावनियाँ आने लगी. मेरे कंप्यूटर में मेरी कई कहानियों गज़लों आदि की कई फाईलें हैं और चेतावनियाँ आने लगी कि आप की इतनी इतनी फाईलिं खतरे में हैं. एक कंपनी की तरफ से ‘वाइरस निरोधक प्रोग्राम’ का भी एक संदेश मिला और कहा गया कि क्रेडिट कार्ड से इतने इतने पैसे भरो! फिलहाल मैंने ऐसा कुछ न किया और फ़ौरन अपने बेटे को जो सॉफ्टवेयर में खासी मास्टरी रखता है, उस के ऑफिस में धुक्धुकाती छाती से फोन किया. बेटे ने कहा – ‘पापा आप की ओर से फेसबुक पर मुझे बड़ा वल्गर संदेश मिला है!’ मैं चकरा गया पर बेटे ने आ कर गुत्थी सुलझाई. पर तब तक तो मेरे मोबाईल पर ही मेरी कुछ परिचित महिलाओं के एस.एम.एस आने लगे. एक युवा शायरा लिखती हैं – ‘यह क्या मेसेज हैं अंकल कि मैं फिल्म अभिनेत्री बन सकती हूँ बशर्ते कि... आगे वल्गर तरीके से लिखा है कि बशर्ते कि मैं एक्स्पोज़ होने को तैयार हो जाऊं!’ मैंने चौंक कर उस युवा शायरा से फोन पर बात की पर उसने तुरंत फिर मुझे एस.एम.एस भी किया कि मुझे भी लगता है यह कोई वाइरस होगा अंकल जी. भला आप क्यों इतना गंदा संदेश मुझे देने लगे? आखिर आप तो मुझे अपनी बेटी ही मानते हैं न!’
जब तक बेटा ऑफिस से लौटे तब तक मेरे प्राण दरवाज़े पर ही अटके रहे. इस बीच घर में ही उपलब्ध एक और लैपटॉप खोला और उस में देखा मेरे फेसबुक खाते में तीन चार संदेश थे. असम के एक मित्र लिखते हैं – ‘मैंने ऐसा क्या किया जिसके लिए मुझे शर्म आनी चाहिए?’ यानी उस परम मित्र को यह संदेश गया कि आप को अपने किये पर शर्म आनी चाहिए? एक महिला को संदेश गया कि आप शीघ्र ही बिकिनी वाले पोज़ में प्रसिद्ध होने वाली हैं. उस महिला ने भी मेसेज भेज कर पूछा – ‘इस प्रकार के भद्दे संदेश का मतलब सर? क्या आप से मैं ऐसी आशा रख सकती हूँ.’ और मज़ेदार बात यह कि मेरे न भेजे हुए परन्तु हर फेसबुक मित्र को फिर भी प्राप्त हुए हर संदेश के साथ भी वैसा ही नीले अक्षरों वाला लिंक था. पर सब के सब जानकार लगते थे शायद. उन्होंने लिंक को क्लिक किया ही नहीं! मैं ही बुद्धू निकला. वर्ना उनके साथ भी वही होने वाला था जो मेरे साथ हुआ. यानी उनकी तरफ से अश्लील और भद्दे सन्देश उन के मित्रों तक पहुँच गए होते. बेटा आया तो मेरी जान में जान आई. बेटे ने समझाया कि गलत सलत लिंक क्लिक करने से आपका फेसबुक अकाऊंट हैक हो गया है और सब मित्रों को अश्लील सेक्सी प्रकार के संदेश पहुँच रहे हैं. बेटे ने यह भी बताया कि पापा इसे कहते हैं ‘फिशिंग स्कैम’. फिर उसने अपने ऑफिस के लैपटॉप पर गूगल खोल कर मुझे दिखाया कि ‘फिशिंग स्कैम’ होता क्या है. गूगल के रस्ते वह विकीपीडिया पहुंचा और वहाँ लिखा था कि यह मछली पकड़ने जैसा एक इंटरनेट अपराध है जिस के ज़रिये आप का क्रेडिट कार्ड नंबर और बैंक खाता आदि पता कर लिये जाते हैं. आप का पासवर्ड भी अपराधियों के हाथ आ जाता है. (अब तो विस्तृत अध्ययन से यह सुध भी हो गई कि जब 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सीदी शहर में एक नागरिक ने पुलिस की ज्यादतियों के कारण आत्मदाह कर लिया था और देश में विद्रोह की आग भड़क उठी तब वहाँ के तत्कालीन तानाशाह राष्ट्रपति ज़िने एल एबिदीन बेन अली ने वहाँ के इंटररनेट उपयोक्ताओं के फेसबुक खातों को ‘फिशिंग स्कैम’ के ज़रिये हाईजैक करवा लिया था!), पर बहरहाल, बेटे के कहने पर मैंने अपना पासवर्ड बदला पर मेरी मुसीबत अभी खत्म नहीं हुई थी. मैंने दूसरे लैपटॉप पर अपने खाते की ‘वाल’ में एक सर्कूलर भी सब के लिए छाप दिया कि दोस्तो, मेरे साथ ऐसा ऐसा हुआ है, अगर आप को भी अश्लील संदेश आया है तो इस अबोध बंदे को बख्श दें. कुछेक युवा लेखकों लेखिकाओं ने मेरे सर्कूलर पर अपनी टिप्पिणियां भी लिख दी कि अंकल जी हमें भी ऐसा एक संदेश मिला है, पर आप घबराएं बिलकुल नहीं. हम समझ गए कि ऐसा किसी फेसबुक ट्रैजिडी के कारण हुआ है. पर मेरी असली मुसीबत तो तब आई जब मैं एक दिन आकाशवाणी के निमंत्रण पर ‘कविता के सात रंग’ कार्यक्रम में श्रोतागण में बैठ कर कविताएं सुनने गया. आकाशवाणी के वी.आई.पी लाऊंज में ही एक परिचित लेखिका मित्र मिल गईं पर मैं उन्हें तीन चार बार नमस्कार कर गया, उन्होंने गुस्से में दूसरी ओर देखना शुरू कर दिया. मैं संतप्त था और उन से आखिर पूछ ही लिया – ‘आखिर क्या गुनाह किया है मैंने, कि आप मेरे नमस्कार का जवाब तक नहीं दे रही हैं?’ महिला कुछ आक्रोश भरी निगाहों से मेरी ओर देख कर बोली – ‘बात करेंगे न बाद में. मैं बताऊंगी.’ और कार्यक्रम के बाद बाहर आ कर वे कहने लगी – ‘आपने फेसबुक में यह क्या संदेश भेजा मुझे? क्या यही है आपकी सभ्यता?’
- ‘आह!’ मैं तो बुरी तरह आहत था. मैं इन्हें आखिर कैसे समझाऊँ? ये भी
वरिष्ठ आयु की हैं और नौजवान बच्चों की तरह समझें या न समझें जो कि सॉफ्टवेयर में काफी जानकारी रखते हैं. वे मेरी सफाई के बावजूद कहने लगी – ‘अपने आप ही मुझे यह संदेश आ गया कि क्या आप निर्वस्त्र हो सकती हैं? आपने भेजा ही नहीं?
मुझे हाथ तक जोड़ने पड़े और उन से यह कहना पड़ा – ‘आप की बेटियां जॉब करती हैं और अभी हाल ही में उन्होंने एम.बी.ए वगैरह किया है. आप प्लीज़, मुझ पर रहम खा कर घर जा कर मेरी यह सफाई बेटियों को बताएं.’ महिला अविश्वास में मेरी तरफ देखती चली गयी और जाते जाते कह गयी – ‘मैं टीचर हूँ सर, कभी कभी अपनी स्टूडेंट्स को ही कह देती हूँ मेरा खाता खोल कर बताएं कोई संदेश तो नहीं है! मैं फेसबुक में इतना ज्यादा जाती भी नहीं.’
पर ईश्वर की मुझ पर विशेष कृपा हुई और रात साढे ग्यारह बजे उन महिला का एस.एम.एस मिला कि हाँ सर, मैं अब कन्विन्स हो गई हूँ कि वह वाइरस था, पर आप को पहले ही पता था तो मुझे पहले ही क्यों नहीं सूचित किया आपने?’
बच्चियों से पूछने के बावजूद सब कुछ उस के सामने शायद साफ़ नहीं था. यदि मुझे पता होता तो मैं स्वयं ही ‘आ बैल मुझे मार’ के अंदाज़ में ऐसे किसी लिंक पर क्लिक क्यों करता. बहरहाल, उस महिला को तो बाद में हर बात स्पष्ट कर दी और दोस्ती पहले की तरह बरक़रार रही, पर मैं सोचने लगा इन्टरनेट एक नया आविष्कार है जो पिछले दो दशक में हमारी जिन्दगी में तूफानी परिवर्तन ला चुका है. पिछले कुछ समय में अरब में हुई क्रांतियों में भी लोगों को एकजुट करने में इन्टरनेट की बड़ी ज़बरदस्त भूमिका रही. क्या इसकी घटनाओं दुर्घटनाओं की पूरी समझ सब के लिए ज़रूरी नहीं, जो जो लोग इस का उपयोग करते हैं, उनके लिए?’ बेटे ने तो यह भी बताया कि वाइरस निरोधक प्रोग्राम बेचने के लिए कुछ कम्पनियाँ यह शरारत करतीं हैं. कुछ तो ऐसी भी हैं जो क्रेडिट कार्ड से पैसा भेजने के बावजूद कोई वाइरस निरोधक प्रोग्राम नहीं भेजती, यूं ही पैसा लूट लेती हैं. बहरहाल, मेरा वह ज़ख़्मी लैपटॉप बेटे ने तीन चार दिन में ही ठीक भी कर दिया और अब मैं फेसबुक हो या अपनी मेल, किसी भी लिंक को ऐसे देखता हूँ जैसे दूध का जला हूँ और छाछ को भी फूंक फूंक कर पी रहा हूँ. पर क्या इसके बावजूद इन्टरनेट और फेसबुक को ही तिलांजलि देने से काम चल जाएगा? शायद नहीं. बिलकुल नहीं. वह तो एक अपरिहार्य साधन बन गया है न जिंदगी का, जिसके ज़रिये क्रांति भी की जा सकती है!
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Thursday, December 30, 2010

मेरी 'सिस्टर'

मेरी ‘सिस्टर’
संस्मरण - प्रेमचंद सहजवाला
भारतीय समाज नारी पुरुष सन्दर्भ में कई पुराने धरातलों पर से चलता हुआ अब कम से कम शहरों में किसी आधुनिक व शिक्षित कही जा सकने वाली ज़मीन पर आ खड़ा हुआ है. कोई समय था जब देश के ही समाज सुधारकों को लगा था कि हमारे देश में नारी क्योंकि अशिक्षित ही रह जाती है, इसीलिए ब्रिटिश जैसी फिरंगी कौम हम पर फब्तियां भी कसती है और हमें पिछड़ा हुआ भी मानती है. यह देश तो ऐसी ऐसी महिलाओं पर गर्व करता रहा जो पतियों द्वारा पीड़ित रही जैसे द्रौपदी हो या सीता, या अहिल्या हो, ये सब पूज्य मानी जाती हैं पर जिस नारकीय जीवन में ये सब एक पुरुष प्रधान समाज द्वारा धकेली गई, वह भी कम शर्मनाक नहीं...
पर दूर क्यों जाएँ, मैं तो सन् 59-60 की बात कर रहा हूँ. तब मैं नौवीं कक्षा में ही पढ़ता था और मेरी बड़ी ‘सिस्टर’ किसी स्कूल में मात्र चालीस रुपए वेतन पर अध्यापिका भी थी तथा शाम को निजी कॉलेज में एफ.ए. भी पढ़ रही थी. मुझे एक दिन समझिये बुखार हो जाता है पर मैं ज़िद्दी लड़का हूँ. पढ़ने का ज़रा भी हर्जा हो, मुझे गवारा नहीं. सो सुबह मैं मां में मना करने के बावजूद नाश्ता कर के तैयार हो कर स्कूल चला जाता हूँ जो नज़दीक ही है. मां ने एक डोज़ दवाई का सुबह ही खिला दिया था और मैं स्कूल चल पड़ता हूँ.
मेरी बड़ी दीदी तो थी एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल में जो अभी हाल ही में केवल सोलह बच्चों को ले कर खुला था पर मैं जिस स्कूल में पढ़ता था वह बना था तंबुओं में! सब कक्षाएं तंबुओं में और पुस्तकालय तथा भौतिक व रासायनिक प्रयोगशालाएं भी तंबुओं में!
अब देखिये, ‘रिसेस’ होती है तो हल्की हल्की बूंदाबांदी होती है और हम सब लड़के उस बूंदाबांदी में भी थोड़ा थोड़ा खेल रहे हैं. सामने ही कैंटीन है जिस के अंदर कुछ मास्टर लोग भी बैठे चाय पी रहे हैं. स्कूल में केवल लड़के ही लड़के हैं और ऐसे में स्कूल में प्रवेश करती है एक लड़की. लड़की हल्की हल्की बूंदाबांदी में छाता हाथ में थामे, एक थर्मस में थोड़ा सा दूध और लंच बॉक्स में थोड़ी सी रोटी सब्ज़ी व पर्स में कुछ गोलियाँ बुखार की लिये स्कूल की कैंटीन के बाहर ही बने मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करती है. किसी अध्यापक से जाने क्या पूछती है. उसी समय क्या होता है कि घंटी बज जाती है और रिसेस खत्म! हम सब भाग जाते हैं क्यों कि मास्टर लोग बड़े ज़ालिम थे. अपनी अपनी सीटों पर मुस्तैदी से जा कर बैठ जाते हैं. शायद सब से पहले पहुँचने वालों में मैं था पर उस के बाद जो लड़के एक एक कर के क्लास (तंबू) में प्रविष्ट हुए तो मेरी जैसे शामत आ गई. पहले एक लड़का हांफता सा बोला – ‘प्रेमचंद, बाहर तेरी ‘सिस्टर’ आई है.’ फिर यह जैसे मास्टर द्वारा पढाया हुआ कोई पाठ हो गया – ‘प्रेम, तेरी सिस्टर आई है.’ लगा जैसे लड़कों के घर में ना तो कोई बहन है ना कोई लड़की इन्होने कभी देखी है. छाता हाथ में पकड़े एक अपेक्षाकृत आधुनिक सी दिखती लड़की को देख सब पर जैसे एक विचित्र सी प्रतिक्रिया होती है, हर कोई क्लास में घुसते ही कहता है – ‘प्रेम तेरी ‘सिस्टर’ आई है.’ मैं उस समय और अधिक चकित हुआ जब जो अध्यापक क्लास लेने आया उसने कुर्सी पर बैठते हुए ही मुझे यह इत्तिला दी कि बाहर तुम्हारी ‘सिस्टर’ आई है, दवाई ववाई लाई है शायद. इतना तो ठीक, पर कुछ देर बाद एक के बाद एक दो अध्यापक आए और तंबू में एक खिड़कीनुमा जाली में से अंदर झाँक कर सीधे लड़कों से ही कहने लगे – ‘प्रेम की ‘सिस्टर’ आई है, बाहर भेज दो.’ सचमुच, मेरे लिये यह एक बेहद नायाब सा अनुभव था. पर उस स्कूल के लड़कों की आक्रामक जिज्ञासा से मैं कई दिन तक भयभीत भी था. ये तो वो लड़के थे जो कभी सामने ही एक पहाड़ी पर बने घने से जंगल में किसी प्रेमी युगल को देख लेते तो रिसेस में इकट्ठा हो कर इतनी ज़ोर से दहाड़ते दहाड़ते युगल को दूर से ही डरा देते, जैसे इस जोड़े को ये सब मिल कर कच्चा खा जाएंगे. जैसे यह जोड़ा ही उनके लिये जलेबी जैसी कोई स्वादिष्ट सी चीज़ हो. इसलिए हुआ यह भी कि मैं जब ग्यारहवीं परीक्षा में आया तो बोर्ड की परीक्षाओं में मेरा परीक्षा केन्द्र बना देव नगर का ‘खालसा हाइ स्कूल’. मेरी ‘सिस्टर’ एक दिन पहले ही वह केन्द्र देख आई और परीक्षा के पहले दिन स्कूल से आधे दिन की छुट्टी ले आई. परीक्षा केंद्र में पहुँचने वाले सब से पहले दो व्यक्ति हम ही थे. हॉल बहुत बड़ा था. मेरी ‘सिस्टर’ दूर दूर तक तेज़ी से चलती हुई मेरा रोल नंबर देख आई और मुझ तक पहुँच कर मुझे वहीं ले गई. उसने मुझे कई अच्छी बातें बताई कि पेपर को ध्यान से पढ़ना और घबराना बिलकुल मत. हमेशा की तरह इस बार भी फर्स्ट आना है तुझे. पर मैंने क्या किया कि सीट पर अपना सब कुछ रख कर ही अपनी ‘सिस्टर’ की जान खाने लगा – ‘अब तुम घर चली जाओ, फिर स्कूल में ड्यूटी पर जाना. थोड़ी ही देर में यहाँ बहुत लड़के आ जाएंगे.’ ‘सिस्टर’ गुस्से में बोली – ‘लड़के आ जाएंगे तो मुझे खा जाएंगे क्या?’
- ‘नहीं तुम चली जाओ ना.’
पर ‘सिस्टर’ खड़ी ही रही और लड़कों ने एक एक कर के आना शुरू कर दिया. मेरी हालत यह देख कर और अधिक आश्चर्य से भरने लगी कि मेरी क्लास के लड़के आ कर अपना रोल नंबर ढूंढ कर मेरी ‘सिस्टर’ के पास ही आते और नमस्ते कर के ठिठक कर एक तरफ खड़े हो जाते. ‘सिस्टर’ उनको भी अच्छी सलाह देने लगी और बताने लगी कि जल्दबाजी में कई बार जो आता है वह भी विद्यार्थी गलत लिख कर आता है. सब लड़के खुश थे. जैसे पल भर में ही वे सहसा सुधर कर सभ्य लड़कों में तब्दील हो गए होँ. और जब अंत में ‘सिस्टर’ सचमुच जाने लगी तब उन लड़कों के चेहरों पर टपकी शर्मिंदगी और अधिक ज़ाहिर होने लगी जब ‘सिस्टर’ एक एक लड़के से हाथ मिला कर उसे ‘गुड विशिज़’ दे कर जाने लगी. मैं परीक्षा में उत्तर लिखते लिखते भी सोच रहा था कि एक दिन भी अगर मेरी ‘सिस्टर’ इस स्कूल में टीचर बन कर आ गई तो ये सब लड़के पहले दिन ही सुधर कर सभ्य हो जाएंगे.

Wednesday, December 29, 2010

‘नॉस्टाल्जिया’ - प्रेमचंद सहजवाला

‘नॉस्टाल्जिया’
प्रेमचंद सहजवाला
सन् 70-80 के दशक में मैं सोनीपत में तैनात था व खूब कहानियां लिखता था. तभी एक दिन एक मित्र ने आ कर बताया कि दिल्ली में मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित एक फिल्म चल रही है ‘रजनीगन्धा’. ‘रजनीगन्धा’ देख कर मैं चकित था और लगा था कि कहानी अब कागज़ से उड़ कर पर्दे पर आ गई है. पर इस से भी ज़्यादा प्रभावित मैं तब हुआ जब मैंने श्याम बेनेगल की फिल्में ‘अंकुर’ व ‘मंडी’ देखी. इसके बाद देखी गोविन्द निहालानी की ‘अर्ध-सत्य’. मेरे लिये सचमुच यह चमत्कार सा था कि कहानियों की जिन प्रवृत्तियों को हम इतना अधिक विश्लेषित कर के उन्हें ‘नई कहानी’ या ‘साठोत्तरी कहानी’ जैसी संज्ञाएं देते हैं, वे सब के सब रचना तत्व ज्यों के त्यों पर्दे पर फ़िल्मी विधा के रूप में भी मौजूद है. फिल्म ‘अर्ध-सत्य’, ‘अंकुर’ व ‘मंडी में तो मुझे नई कहानी का बिम्ब विधान भी नज़र आ गया और इस के बाद मैं इस सामानांतर कहे जाने वाले सिनेमा का दीवाना सा हो गया. मैंने ‘स्पर्श’, ‘पार’, ‘अंकुश’, ‘सुबह’, ‘निशांत’ आदि कई फिल्में देखी. पर जिस फिल्म ने मेरे मन पर एक प्रकार से जीवन भर का प्रभाव डाला वह थी शबाना आज़मी–मार्क जुबेर-दीप्ति नवल द्वारा अभिनीत फिल्म ‘कमला’. ‘कमला’ फिल्म वैसे तो एक वास्तविक घटना पर आधारित थी जिसमें ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ के संवाददाता अश्विनी ने भारत के किसी इलाके से एक लड़की खरीदी और उस समय के पत्रकारिता जगत में यह साबित कर के तहलका मचा दिया कि आज भी भारत में लड़कियां खरीदी और बेची जाती हैं. पर फिल्म बनाते समय उसके पत्रकार मार्क जुबेर को एक महत्वाकांक्षी पत्रकार दिखाया गया जो किसी दूरस्थ इलाके से एक लड़की ‘कमला’ (दीप्ति नवल) खरीद लाता है और उसे अपने कैरियर का मोहरा बनाना चाहता है. पर फिल्म के मध्यांतर से पहले के आखिरी दृश्य में अचानक खरीदी हुई लड़की ‘कमला’ मार्क जुबेर की पत्नी शबाना आज़मी से पूछ बैठती है – ‘तुम को कितने में खरीद कियो?’ शबाना का मुंह फटा का फटा ही रह जाता है और वही स्थिति हॉल में बैठे असंख्य दर्शकों की हो जाती है. फिर मध्यांतर के बाद शुरू होती है उस महत्वाकांक्षी पत्रकार की पत्नी शबाना आज़मी की दर्दीली कहानी. अपने चरम तक आते आते फिल्म यह साबित कर चुकी होती है कि ‘कमला’ सिर्फ वह नहीं है जो पैसे दे कर खरीदी या बेची जाती है बल्कि भारतीय समाज में तो हर ‘कमला’ हर मोड़ पर मिल जाएगी, एक खरीदी हुई बांदी की तरह. पुरुष प्रधान समाज में शोषित नारी की तस्वीर दिखने वाली शायद इस से अधिक सशक्त फिल्म कोई न हो. नारी हर जगह ‘कमला’ की तरह खरीदी हुई बांदी की तरह है. एक दृश्य में शबाना तड़प कर मार्क से कहती है – ‘नहीं नहीं मैं कमला हूँ... तुमने मुझे खरीद रखा है मैं कमला हूँ...’ फिल्म में वे सांकेतिक दृश्य बहुत प्रभावशाली हैं जिनमें एक पत्नी के रूप में शबाना केवल पति के कामों में लगी रहती है, उसी का कोट हैंगर से उतार कर सही जगह लगा रही है, उसी का फोन अटेंड करती है. समाज में उसकी पहचान केवल एक मिसेज़ खन्ना के रूप में है. ऐसा महत्वाकांक्षी बुद्धिजीवी व्यक्ति पत्नी को केवल इस्तेमाल करने की एक वस्तु स समझता है और जब उसे सेक्स की ज़रूरत महसूस होती है तभी वह उसके शोषण के तौर पर उसके सामने अपनी डिमांड रखता है. कहानी में एक आदर्शवादी पत्रकार ए.के.हंगल भी है जो जुबेर से पूछता है – ‘भई किसी अखबार में लिखा है तुमने ‘कमला’ को दो सौ में खरीदा किसी में लिखा है ढाई सौ में..’ तब मार्क जुबेर गुरूर से कहता है – ‘आप सही जानकारी के लिये हमारे अखबार पढ़िए न!’ फिल्म के प्रारंभ में जब उस दूरस्थ इलाके में जुबेर ‘कमला’ को खरीद कर अपनी गाड़ी में बैठता है तब ‘कमला’ उस गाड़ी में नहीं बैठती वरन अपनी गठरी संभाले किसी बंधे हुए डोर सी गाड़ी के पीछे पीछे दौड़ती नज़र आती है. जब वह पत्रकार के घर आ जाती है तब उसके प्रति पत्रकार की तटस्थता देखने योग्य है. किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह ‘कमला’ घर में सोफे पर नहीं बैठती या घर के मेम्बर की तरह का कोई दर्जा उसे नहीं मिलता, वरन वह तो ज़मीन पर उकडू बैठी भिखारिन सी इधर इधर फटकती रहती है और जब जुबेर पहली बार अपने पत्रकार समूह के सामने उसे कार में लाता है तब उस का पत्रकार दोस्त अनु मलिक कार के बाहर उसका मखौल सा उड़ाता गाने लगता है:
कमला रानी बाहर आओ / बाहर आ कर दरस दिखाओ..
खरीदी हुई लड़की के प्रति ऐसा वितृष्णात्मक नजरिया हो या बीबी को इस्तेमाल करने वाली एक वास्तु समझने का नज़रिया, ‘कमला’ फिल्म हर दृष्टि से एक बेहद सशक्त फिल्म बन पड़ी जिस में ‘साठोत्तरी कहानी’ की तरह पात्र अपनी परिस्थियों के विरुद्ध एक मोर्चा स बांधे खड़े हैं, भले ही वे हार जाएँ. आज जब ‘तारे ज़मीन पर’ और ‘पीपली लाईव’ जैसी सशक्त फिल्में देखने को मिलती हैं, जिनमें समाज के वास्तविक पात्र हैं और जीवन के सामानांतर चलती कहानियां हैं तो उस ज़माने की यादें सहज ही आ जाना स्वाभाविक है. हिंदी सिनेमा हिंसा और ग्लैमर की दुनिया में भटकता हुआ इन असली फिल्मों से किस कदर वंचित रहा, यह इन् तमाम फिल्मों को देख कर सहज ही समझा जा सकता है. काश ‘रजनीगन्धा’ ‘अर्धसत्य’ ‘कमला’ व ‘सुबह’ जैसी फिल्में नियमित रूप से आज भी, इस बदले हुए तकनीक और माहौल में बनें. कम से कम समाज को सोचने वाला और प्रबुद्ध बनाने के लिये यह एक स्वस्थ बात होगी.

Thursday, January 28, 2010

'वह एक दिन...'

संस्मरणात्मक कहानी - प्रेमचंद सहजवाला

मुंबई से लोकल पकडो तो लगभग चालीस मिनट बाद एक स्टेशन आता है - उल्हास नगर. आजकल वह एक महानगर जैसा है, जिसमें करोड़पति व्यापारी तक रहते हैं. पर जिस ज़माने की मैं बात कर रहा हूँ उस ज़माने वह सिंध से आए हुए शरणार्थियों का एक शिविर मात्र था. छोटे छोटे, माचिस की डिब्बिया जितने घर, जिनमें दस-दस बीस बीस प्राणी कैसे रहते होंगे, यह सहज ही कल्पना की जा सकती है. गरीबी घर घर में एक सदस्य की तरह रहती थी. औरतें हर समय आंसू बहाती थी और पुरुष हर समय नौकरी के लिए दिन भर धक्के खाते थे. रिफ्यूजी बैरकों में बारह बारह घर होते थे और रात को जब इतने बड़े-बड़े परिवार बैरकों के बाहर चारपाइयाँ डाल सोते थे, तो लगता बाढ़-वाढ़ से पीडितों का एक लावारिस समूह सा है. अलबत्ता कई बार चांदनी का भरपूर मज़ा ले कर आपस में हंसने खुश होने के बहाने सब ढूंढ लेते थे. कभी तो बड़ी बड़ी उम्र की औरतें भी कोई सामूहिक गीत गा कर या कहानी कह कर सोने जाती थी. बच्चे, जब तक माएं काम से फारिग हो कर बाहर चारपाइयों पर आयें, तब तक बिस्तरों पर ऊधम मचाते, कलाबाज़ियां करते और खिलखिलाते.
ऐसे में शिक्षा का क्या हाल होगा, यह भी समझा जा सकता है. मैं एक नगर निगम के स्कूल में पहली में दाखिल हुआ, जहाँ मास्टर दो चार बातें पढ़ा कर दरवाज़े पर बीड़ी पीने बैठ जाता था और रविवार को किसी न किसी क्लास को नज़दीक ही बने अपने घर में बुला लेता था. घर क्या था एक बड़े और फटीचर से हॉल में टाट की बोरियों से पार्टीशन बने होते थे और वह खुश हो कर हमेशा कहता था – ‘मेरे घर में कुल छप्पन लोग हैं.’ यानी सात भाई, उनके के बेटे बहुएं और बेटों के उतने ही बड़े बड़े कुनबे और उन मास्टर जी के पिता. पिता वृद्ध थे सो रोज़ एक रजिस्टर ले कर कोई न कोई टाट हटा कर अन्दर बैठी बहुओं का सिर खाते. किस बच्चे ने नहा लिया, किस ने अभी नहीं नहाया और किस ने नाश्ता कर लिया, किसको अभी करना है, इस सब की अटेंडेंस सी लगाते. हम बच्चे सोचते कि मास्टर जी कुछ मीठा खिलाएंगे और हम सब कुछ खेल कूद कर घर लौटेंगे. पर मास्टर सब बच्चों को सेवा का मूल्य बता कर कुछ प्लेटें या थालियाँ पकड़ा देता. बाहर दो तीन नगर निगम के नल्के दिखा देता और हम उन गंदी प्लेटों को रगड़ रगड़ कर धोते और एक दूसरे से प्रतियोगिता करते. मास्टर शाब्बास देता और आख़िर में जो सेऊ बांटता उसके बहुत कम हिस्से का नमकीनपन मुंह को महसूस होता..
चौथी पास की तो एक और स्कूल में गए. यहाँ एक बड़े से वर्गाकार हॉल में, जिसे लोग 'कांग्रेस ऑफिस' कहते थे, लकड़ी की पार्टीशन लगा कर कई कक्षाएं बनाई गई थी. रिसेस के समय ऐसे लगता जैसे खतरनाक बाढ़ आयी नदी का पानी ज़ोर ज़ोर से बह रहा है. बहुत असहनीय सा शोर होता. सुबह सब से बीच वाले पार्टिशनों के बीच खड़ा वाईस-प्रिंसिपल कर्कश आवाज़ में प्रार्थना करवाता – ‘वंदे.. मा..तरम.’ उस के पीछे तीन सौ बच्चों की आवाज़ गूंजती. ‘वंदे... मा...तरम.’ बाहर साइकलों पर आते जाते लोगों को भी पता चलता, प्रार्थना हो रही है. अंत में वाईस- प्रिंसिपल चिल्ला कर कहता - ज...य हिंद. सब को चिल्ला कर कहना होता - ज...य हिंद. तीन बार यह करना पड़ता. यदि किसी बच्चे ने क्रम तोड़ दिया और बीच में ही बोल पड़ा - जय हिंद, तब वाईस-प्रिंसिपल चिल्ला कर कहता - इस लड़के को मेरे पास भेजो. अन्दर खड़ा मास्टर या मास्टरनी उसे बाहर भेज देती. लड़का क्लास से बाहर ऐसे निकलता जैसे सीमा पर शहीद होने जा रहा हो...

एक मास्टर थे, वह दूसरों की तुलना में इतने जालिम थे की उन का नाम लड़कों-लड़कियों ने रख दिया यमराज. खूब पीटते. हिन्दी और सामाजिक ज्ञान पढाते. बड़ी आयु के थे. नाम था शीतल दास और स्वाभाव से बेहद गरम. क्लास में घूमते तो बच्चों की हालत अच्छी न होती. बेहद भयभीत से रहते. कभी कभी अचानक टेस्ट लेते. कर्कश आवाज़ में प्रश्न पूछते – ‘घोड़ा का बहुवचन?’
लड़का स्त्रीलिंग-पुल्लिंग याद कर के आया होता. फ़ौरन जवाब देता – ‘घोड़ी.’
लड़के की कमीज़ का कॉलर मास्टर के खूंखार पंजे में आ जाता. लड़के का फंसा हुआ चेहरा नीचे, ज़मीन की तरफ़ डूबता जाता, जब तक कि उसकी नाक ज़मीन न सूंघ रही हो. मास्टर की लात उस की कमान की तरह मुड़ी हुई पीठ पर पड़ती.

लड़कियों को वे मास्टर नहीं मारते थे. पर लड़की को सामने खड़ा कर के ऐसी झाड़ पिलाते कि लड़की की घिग्घी बंध जाती. रिसेस या छुट्टी में उस की सहेलियां उससे कुछ ज़बरदस्ती बुलवाती और मूड ठीक करने की कोशिश करती. लड़की फूट फूट कर रो पड़ती. वैसे हाथ तो कमोबेश सभी अध्यापक चलाते थे, कुछ अध्यापिकाएं भी कुछ कम गरम-मिज़ाज नहीं थी, पर इन मास्टर शीतल दास से तो अध्यापकों को भी नफरत थी. कुछ अध्यापिकाओं ने लड़कियों की तरफदारी कर के उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि बहुत घबरा जाती हैं. पर मास्टर बुज़ुर्ग थे और बेहद क्रूर भी तो थे. सलेटी बाल दो असमान हिस्सों में बँटे और आंखों पर मोटे मोटे शीशों वाला उनके जितना ही निर्मम सा चश्मा. चेहरे और नाक की चमड़ी खुरदरी सी. अध्यापिकाओं में से एक दो युवा अध्यापिकाओं को भी ऐसी झाड़ पिला दी की फ़िर उन के सामने कोई न बोल सकी

शीतल दास में किसी भी किस्म का रहमो-करम हो, ऐसा कभी नहीं लगता था. स्कूल में युवा अध्यापक थे, तो सातवीं आठवीं की कुछ सुंदर लड़कियां भी. पर ज़माना इतना आधुनिक नहीं था कि बातचीत की स्वतंत्रता हो या कोई किस्सा सुनने को मिले. पर एक दिन देखें तो क्या होता है. एक नौजवान मास्टर हैं, रिसेस के बाद आते हैं तो देखते हैं कि क्लास में अभी केवल एक ही लड़की आयी है. मास्टर उस सुंदर लड़की को देख अपने चरित्र से गिर जाते हैं. लड़की को किसी बहाने पास बुलाते हैं. और.. बस उस के गाल को चूम लेते हैं, और झट से कुर्सी पर बैठ जाते हैं. लड़की स्तब्ध सी थी. ऐसा कभी हुआ नहीं. बाकी विद्यार्थी आ गए. पर वह किसी से कुछ बोली नहीं. चुपचाप सब पीरियड पढ़ती रही. स्कूल में छुट्टी भी हो गई. मास्टर को उस क्लास में या बाद में अन्य क्लासों को पढ़ाते समय कुछ धुकधुकी सी ज़रूर हुई होगी. पर छुट्टी तक कुछ न हुआ तो उस का डर जाता रहा. प्रिंसिपल और वाईस-प्रिंसिपल वाले पार्टीशन के साथ वाले पार्टीशन में बैठे सभी अध्यापक-अध्यापिकाएं कॉपियाँ चेक करने लग गए. उस से साथ वाली पार्टीशन में गुस्सैल सा पढने का चश्मा लगाये शीतल दास . कुछ देर सन्नाटा सा लगता है. अचानक एक नौजवान आता है. पूछता है – ‘मास्टर गोपाल कौन से हैं?’
सब की गर्दन मास्टर गोपाल की तरफ़ उठ गई.
वह लड़का गोपाल मास्टर को कॉलर से पकड़ कर घसीटना शुरू कर देता है. देखते देखते सात लड़के और आ जाते हैं. गोपाल को बाहर घसीट दिया जाता है. पार्टिशनों के बीच उनकी धुनाई शुरू हो जाती है. सब के सब सकते में आ जाते हैं. मास्टर को खींच कर एक दीवार से उन का सर पटका जाता है. लड़का उसी लड़की का भाई है, जिस लड़की से ये लड़के कह रहे हैं, मास्टर ने बदतमीजी की है. गोपाल हाथ जोड़ते हैं, रोते हैं. उन की नाक से खून बह रहा है. सब को लगता है, कुछ करना चाहिए. अपराध की काफ़ी सज़ा पा गए गोपाल मास्टर. प्रिंसिपल के पास जाते हैं सब. प्रिंसिपल लाचार है. वाईस-प्रिंसिपल जो सुबह प्रार्थना में गलती होने पर खूब हाथ जमाते हैं, वे किसी बहाने बाहर चले गए हैं.

सब का ध्यान शीतल दास वाले कमरे में जाता है. सब से तेज़ हैं, बोलने में भी कर्कश. लड़कों को झाड़ भी देंगे, समझा भी देंगे. सब उन के सामने बेबस से खड़े हो जाते हैं – ‘कुछ कीजिये. गोपाल बहुत पिट गए हैं.’

शीतल दास निस्पंद से सब पर अपनी नज़र टिकाते हैं. धीमे धीमे कहते हैं, जैसे ख़ुद से कह रहे हों – ‘गोपाल ने बदमाशी की है, तो भुगते न?’

समय बदलते देर नहीं लगती. मास्टर शीतल दास बुज़ुर्ग थे. सिंध से विभाजन के समय आए थे. लड़कियां और अध्यापिकाएं कभी कभी उन के बारे में बातें करते हुए कहती थी – ‘तीन बहुएं हैं, एक तो मायके भाग गई है.’
-‘क्यों क्यों?’
- ‘क्यों कि ससुर जो यमराज है ऐ नादान लड़की.’

बहरहाल. एक दिन सब कुछ बदल सा जाता है. हम सब बाहर मैदान में प्रार्थना कर रहे थे उस दिन. कभी कभी प्रिंसिपल अच्छे मौसम में बाहर बने एक ऊबड़-खाबड़ से मैदान में प्रार्थना करने भेज देते थे. वाईस-प्रिंसिपल उस दिन आए नहीं थे. एक मास्टर दयालदास प्रार्थना करवा रहे थे. प्रार्थना पूरी होती है. प्रार्थना के दौरान ही हम ने देखा, एक बाहर का व्यक्ति जिस ने कमीज़ और मैला सा पजामा पहन रखा था, उसने मास्टर दयालदास के कान में न जाने क्या कहा था. प्रार्थना पूरी हुई. हम आदेश का इंतज़ार कर रहे थे कि लाइनों में अपनी अपनी कक्षा में जाएं. पर मास्टर दयालदास जिन के पाजामे का नाला कई बार कुर्ते से बाहर लटक कर नज़र आने लगता था, उस ने सब को रोक कर कहा – ‘बहुत अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि...’ और उस की बात आगे आ कर एक अध्यापिका ने पूरी की – ‘कि मास्टर शीतलदास का...’

और बात पूरी करते करते उस अध्यापिका के चेहरे पर रंग-ढंग इतनी तेज़ी से बदले मानो उसे समझ ही न आ रहा हो कि अब ऐसे क्षण उसे अपना चेहरा कैसा बनाना चाहिए. पल भर में उस मैदान का दृश्य ही बदल गया. मास्टर लोग आपस में कुछ सलाह-मशविरा करने लग गए और लड़कों की तो हालत ही ख़राब थी. एक लड़का अचानक दोनों बाहें खोल कर हवाई जहाज़ सा बना कर खुशी में मारे उड़ने सा लगा – ‘हा हा हा हा हा .. मर गया मास्ट ...र्रर्र.’
कई लड़के भयभीत थे. पर एक दूसरे के कन्धों के गिर्द बाहें डाल कर टहलते हुए मानो आज की घटना का अर्थ समझने लगे. कई एक दूसरे के कानों में मुंह ले जा कर कानाफूसी करने लगे – ‘बहुत मारता था. कह रहे हैं आज ख़ुद मर गया. हा हा...’
-‘चुप बे, क्या भरोसा...’

लड़कियों की हालत विचित्र थी. वे झुंड के झुंड बना कर सोचने लगी कि अब हम सब को करना क्या होगा. क्या उस मास्टर को ज़िंदा करने की योजनाएं बन रही हैं?...

...इस बीच मास्टर दयालदास ने क्या किया कि अपनी दाईं हथेली खोल कर सब के मुंह में खल्ला दिखा कर चिल्ला पड़े- ‘लानत है तुम सब पर. मास्टर शीतल दास गुज़र गए हैं और तुम सब लट्टू भी खेलने लग गए...’ उस मास्टर के गुस्सा करने पर अक्सर अध्यापिकाओं को जी भर कर हँसी आ जाती थी. आज भी न जाने क्या हुआ कि एक अध्यापिका हँसी को पल्लू में दबाती हुई दूसरी को कंधे पर टोहका मार कर आगे खिसक गई... एक सीनियर अध्यापिका ने घोषणा की- ‘सब बच्चे क्लास में जाएं. आज पढ़ाई नहीं होगी. जिस समय रिसेस होगी. हम सब मास्टर शीतल दास के घर जायेंगे...’

शीतल दास के घर के बाहर का नज़ारा ही अजीब था. बहुत विद्यार्थी उस स्क्वेयर में जमा हो गए जिस के तीन तरफ़ बैरकें थी और एक तरफ़ पथरीली सी सड़क. एक घर के बरामदे में शीतल दास जो यमराज माने जाते थे, का पार्थिव शरीर और उनके रिश्तेदारों की भीड़. बरामदे के प्रवेश पर लड़कियों का झुंड सा इकठ्ठा हो कर अन्दर झाँकने की कोशिश करता है. वही सीनियर अध्यापिका आती है. एक बड़ी कक्षा की लड़की उस के कान में फुसफुसाती है- ‘लोग कह रहे हैं कि वो.. वो जो जवान सी औरत इधर आ रही है, वही उनकी बहू है जो मायके भाग गई थी.’ अध्यापिका अपने चेहरे पर एक ठोस और गंभीर सी भंगिमा समय की नज़ाकत को पहचान कर बना लेती है और एक सहेली की तरह अपनी उस विद्यार्थी को चुप रहने का इशारा भी करती है. सब को कई कदम पीछे हट कर कहीं और झुंड बनाने को भी कहती है. लड़कियां सोचती हैं कि हमें तो रोना भी चाहिए, पर गुपचुप फुसफुसाती हैं – ‘रोना आए तब न! जान बूझ कर आंखों में मिर्ची डाल दें क्या...’

कोई लडकी कहती है – ‘जिस को सब से ज्यादा झाड़ पडी हो उस की, ऐसी कोई ढूंढ लाओ. मास्टर की झाड़ याद करके फूट फूट कर रोएगी...’

लड़के अपनी दुनिया में गुम हैं. कुछ सूझ नहीं रहा किसी को, कि हमें क्या करना चाहिए. कोई कोई लड़का झटपट बस्ता ले कर घर पहुँच गया और माँ को बता दिया, एक मास्टर गुज़र गया है.

माँ ज़बरदस्ती बीच में ही घर आए बेटे के मुंह में रोटी-सब्जी के टुकड़े ठूंसती पूछती है – ‘कौन सा मास्टर मर गया?’

लड़का अपना महत्व सा जताता कहता है – ‘है कोई.’ और फ़टाफ़ट दौड़ कर अपने झुंड में पहुंचना चाहता है.
एक लड़का दूसरों का ध्यान खींच कर सब को चकित कर देता है – ‘वो देखो, लोग कह रहे हैं कि डॉक्टर है. पर वह अपनी दवाइयों का बक्सा साथ क्यों ले जा रहा है????’

-‘अबे लोग बता रहे हैं मास साहब की बीबी बेहोश हो गई है, इसलिए.’

कुछ लड़के एक बैरक के पीछे लट्टू खेलने लग जाते हैं. कोई कोई लड़का दूर से ही घबराता सा ऐसे समय लट्टू खेलने वालों को देखता है, फ़िर मुस्कराहट आने पर हथेली से वह मुस्कराहट छुपा देता है. लट्टू खेलने वाला लड़का उसकी तरफ़ देख आँख मारता है तो वह बैठा हुआ लड़का उससे मज़ाक करता है – ‘मास सा’ब आ रहे हैं!...’

और एक लड़का अचानक तेज़-तेज़ और धुक्धुकाती साँस के साथ इधर क्यों आ रहा है? क्या कोई और बड़ी ख़बर सुनाने आ रहा है? लड़का यहाँ, लट्टू खेलने वाले ग्रुप के पास पहुँचता है और कुछ देर उसकी साँस फूल रही होती है, हांफता ही रहता है. कुछ बोल नहीं पाता.

- अबे बोल कुच्छ ..

वो हाँफते हाँफते कहता है – ‘वो जो.. वो जो.. डॉक्टर आया है न... एक लड़का कह रहा है कि वो डॉक्टर मास्टर को जिंदा कर सकता है...’
लट्टू खेलने वाले हाथ सहसा रुक जाते हैं. एक अजीब से भय की झुरझुरी सब के बदन में दौड़ जाती है. एक तेज़ सा लड़का चिल्लाता है – ‘तेरा दिमाग ख़राब है क्या? मरने वाला कभी जिंदा होता है?..’

हम बच्चे थे. क्या जानें कि ऐसा हो सकता है या नहीं. पर वो लड़का दावे के साथ कह कर मानो अपने भीतर का डर भी ज़ाहिर करना चाहता है, अपने करीबी मित्रों के बीच. उसी की दो तीन बार पिटाई भी की थी मास्टर ने जिसे लोग यमराज कहते थे. उस के पिता झगड़ा भी करने आए थे, पर मास्टर को तेज़ देख कर प्रिंसिपल से झगड़ कर चले गए थे.

न जाने किस ने यह भ्रम फैला दिया. किसी ने ऐसी कल्पना भर की होगी. वो लड़का कहने लगा – ‘पर एक बात है, वो डॉक्टर कह रहा है कि पाँच हज़ार दे दो, तो ज़िंदा कर दूँगा...’

सब चकरा जाते हैं. शरीर सुन्न से हो गए हैं. एक अजीब भ्रम सा...और किसी को सूझ ही नहीं रहा कि क्या करना चाहिए हम सब को. क्या जैसे क्लास में बैठते थे, वैसे ही यहाँ मैदान में पलथी मार कर बैठ जाएँ?...

सब को चारों तरफ एक उलझन का सा माहौल लगने लगा था...