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Monday, December 29, 2014

रिफ्यूजी कहानी – प्रेमचंद सहजवाला

                                                                 रिफ्यूजी
कहानी – प्रेमचंद सहजवाला
(हंस 2015 में प्रकाशित)
लीलां बुक्का फाड़ कर रो पडी. भागी को सब...
वो दिन भी बहुत पुराना नहीं, जब साथ के रिफ्यूजी घर में से भागी की ही क्लास में पढने वाला मुरली अभी इस घर में आया ही कि खौफ के मारे बुरी तरह चिल्ला पड़ा था – ‘मौसी....’ और मौसी अपने जबरदस्ती किचन कहे जाने वाले किचन में बेहोश पडी थी. कोयलों वाली अंगीठी उलट चुकी थी, जाने लीलां ने क्या तरीका अख्तियार किया था, इस प्रकार इस दोज़ख सी ज़िंदगी से रुखसत कर जाने का...
घर में लीलां की बहन रुकमा का व बच्चों का रोदन सा मच गया था. लीलां मौसी की पीठ जल कर लाल हो चुकी थी. चेहरे पर भी आंच थी, सब कह रहे थे साधू बाबा ने बचा लिया, वर्ना तो...
आज कमरे में चारों तरफ सुनसान पा कर लीलां मौसी बुक्का फाड़ रो पडी. भागी को सब ताड़का ताड़का कह कर क्यों चिढाते हैं. क्या बिगाड़ा है, मेरी मोटी तगड़ी बेटी ने. ह ह.. सब लोग हँसते हैं. सामने ही गुरुद्वारे में गयी थी. परसाद बंटने की भीड़ थी. पट्टेदार पतलूनें और जम्फर सा कुछ पहने, नाक से लम्बी लटकती नथों वाली औरतों की लाइन भागी के बाईं तरफ थी. उसने जो एक कोहनी से एक बुढ़िया को धक्का दिया तो एक एक कर के पूरी दस औरतें धड़ाम धड़ाम नीचे गिर गईं. हा हा हा हा... पूरे कसबे में बात आग की तरफ फ़ैल गयी थी. भागी... वो न... लीलां की ताड़का सी बेटी. चीखती है तो सिंध तक आवाज़ जाती है और सिंध जहाँ से लद-फंद कर यहाँ आए, वो भी दहल जाता होगा ताड़का की आवाज़ से...
लीलां अब कसबे के सिविल हस्पताल में दाखिल है. सबसे बड़ी भागी, फिर दो बेटे चेतन और सैजू. अब एक और संतान ने द्वार खटखटाया है. सिविल हस्पताल में मैटर्निटी वार्ड है कि मच्छी मार्केट. जहाँ तहां पलंग तो बिछे हैं और कुछ और औरतें ओनों कोनों में ज़मीन पर डिलीवरी के इंतजार में. दाइयां आती हैं और दो चार को झाड़ देती हैं, किसी किसी क्षण चीखाचाखी मचाती हैं. आने वाली संतानों को क्या पता, वे ऐसे रिफ्यूजी कसबे में जन्म ले रही हैं जहाँ के लोगों को खुद खाने के लिए कुछ नहीं. यहाँ देखते देखते नगर निगमिया  नलके पर अकेली कपडे धोती औरतों से बीड़ी सुलगाने को माचिस मांगते ठगों की कमी नहीं. औरतें सामने ही रिफ्यूजी घर में किसी को आवाज़ दे कर माचिस मंगा लेती हैं. अगर कोई ताड़का वाड़का सरीखी हुई तो ठग की हिम्मत नहीं कि कुछ कर जाए, ताड़का चिल्ला कर पूछेगी – ‘कौनसे मोहल्ले से आए हो?’ ठग झुक कर कहेगा – ‘पच्चीस सेक्शन से.’ ‘इधर कहाँ चले? माचिस जेब में नहीं रखते क्या?’ शर्मीली सी मुस्कराहट. और ताड़का माचिस की तीली ऐसे जला कर खीं खीं सी मचाएगी जैसे ठग को ही जलाने जा रही हो. माँ झाड़ेगी – ‘माचिस उसी को दे डायन तू क्यों जला रही है?’ पर ताड़का न हो कर कोई और हुई तो माँ को ही माचिस दे कर चली जाएगी. माँ ज्यों ही  माचिस ऊपर करेगी ठग नीचे झुकने के बहाने औरत के गले में पड़ी चेन ले कर चम्पत. हाय तौबा मचेगी. औरतें इकठ्ठा हो जाएँगी, कहेंगी – ‘इन मुए बदमाशों से तो भगवान् भी डरता होगा. तभी तो...’ औरत कितने दिन रोएगी. घर में पति की मार खाएगी... अजनबी मरद से ज़बान लड़ाई क्यों, इस से तो आँखें लड़ा कर उसी के साथ जहन्नुम वहन्नुम दफा हो जाती हरामज़ादी...
यहाँ बच्चों का अपहरण भी हो जाता है. ताड़का यानी भागी ने तो एक बार पूरा बाज़ार ही सर पर उठा लिया फिर बाद में खूब खिल्ली उड़ी. कोई शरारती सा लड़का माँ से रूठ कर उसे गालियाँ देता तीन घंटे से गायब था. आखिर उसके मामा लोगों ने उसे ढूंढ लिया पर वह तगड़ा सा दिखता कहे कि मैं घर नहीं जाऊंगा. और उसके मामों ने पीट कर सीधा कर दिया उसे. फिर उसे टांगों और बांहों से झुलाते हुए बीच बाज़ार से चले घर कि ताड़का वहीं से गुज़री. – ‘अरे ए ए... देखो सब, इस लड़के को बदमाश उठा कर जा रहे हैं.’ उन मामों के सामने दो पैर दूर दूर तक सड़क में खुपा कर कमर पर दोनों तरफ मुट्ठियाँ खुपाए खड़ी चिल्लाने लगी ताड़का. वो लड़का मामों के चंगुल से निकल भागने को छटपटाने लगा. उसे पता है कि घर जा कर और मार पड़नी है. लेकिन भागी के चिल्लाने पर सामने ही फलूदे मलाई वाला हंसता खिलखिलाता भागा हुआ बाहर आया – ‘अरे जाने दे ताड़का... वो  बदमाश नहीं हैं. लड़का बदमाश है. माँ को तंग करता है... हा हा हा...’ कई और दुकानदार आ गए  हैं, तभी मामे मानो ज़मानत पर छूटे और सफलतापूर्वक अपने भांजे को किडनैप कर के घर ले गए.
इधर सिविल हस्पताल में लीलां दाखिल तो है, पर लीलां की बहन, बहन का परिवार, व खुद लीलां के ही दस दस बारह बारह साल के बेटे सब एक गहरे तनाव में हैं. लीलां का पति घर छोड़ कर जाने कहाँ गुम हो गया है. अब लीलां को बताएंगे तो वह मय बच्चे मर मरा ही न जाए. जब तो पीठ जली थी तब कई दिन तक तो कराहती रही थी लीलां. संध्या होते ही घर की बत्ती भी उसके साथ के घर वाली रुकमा या उसका पति आ कर जलाता था. लीलां को इतनी असह्य पीड़ा अपनी जली चमड़ी पर कि उस घुप्प अँधेरे में एक छाया सी रोती रहती  और भगवन के आगे नाक रगड़ती रहती कि जो तेरा अपराध मैंने किया हो वो अब तो माफ़ कर. मुझसे सहा नहीं जाता.
बाहर इसी बाज़ार से एक दर्ज़ी आया था और रुकमा से बोला था – ‘लीलां बहनजी को पीछे से रोज़ बिजली का करेंट दिया करो. धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा.’
फिर यह क्रम शुरू हो गया. रात नौ बजते ही रुकमा के रेलवे में काम करने वाले पति लीलां को बाज़ार ले जाते. यहाँ घर में बिजली थी पर पीछे जली हुई पीठ पर करेंट कैसे लगाएं धीरे धीरे, यह उस दर्ज़ी को ही पता था. यहाँ वैसे ही पच्चीस वाट का बल्ब जलता जो बैरक की  छत पर ऐसी जगह लगा रहता कि रुकमा और लीलां दोनों के घरों तक चलते फिरते रहने जितनी भर रोशनी दे, स्विच लीलां के घर होता. उधर बाज़ार में दर्ज़ी उन्हें इज्ज़त से बताता.  उसे एक ही लोभ होता कि ताड़का की माँ की पीठ पर से जब उसके ब्लाऊज़ के हुक खोल  कर लाल जली पीठ को नंगा किया जाएगा तो नीचे उसकी कमर व थोडा नीचे खिसकाए जाते पेटीकोट के भीतर इंच भर सही, झाँकने का मौका मिलेगा. कमर नहीं जली थी सो वह ज्यों की त्यों नंगी चमड़ी रूप में मय अपने ग्रूव के नज़र आती. दर्ज़ी मानो कुछ देर सामने  अपने एक स्टूल पर बैठा आँखें सेंक लेता. एक प्लग जैसा टर्मिनल लीलां की पीठ पर घुमाया जाता धीरे धीरे. रुकमा को अहसास होता कि उसका पति बहुत अच्छे चरित्र वाला है तो न तो नंगी कमर या हिप्स की झलक से वह ज़रा भी विचलित होगा. सो कभी आती कभी न आती. पर जिस समय आधे घंटे के लगभग लीलां करेंट पास करवा रही होती उस समय यहाँ एक और ही तमाशा खड़ा हो जाता. ताड़का कहती – ‘मौसा मौसा... एक फलूदा मलाई खिलाओ न...’
सिर्फ ताड़का नहीं, रुकमा का मुरली और छोटी सरू व ताड़का से भी बड़ी रुकमा की समझदार बेटी इंजना भी वहीं आसपास होते. पर मुरली व सरू और लीलां के बेटे सैजू चेतन सब इसी ताक में होते कि मुरली के फराखदिल पिता कभी कभी ताड़का को फलूदे मलाई का एक प्याला ले कर देते हैं और उसे ताकीद करते हैं कि यहाँ अब रेल छेल घूमना नहीं, चुपचाप यहीं दर्ज़ी की दुकान पर बैठ फलूदा मलाई खानी है. पर ताड़का बाहर दौड़ जाती क्योंकि इंजना को छोड़ बाकी चारों बच्चों की टपकती लार का अहसास उसे करना पड़ता और इन मरभुक्खों को भी कुछ खिलाना पड़ेगा. सो वह रेल छेल सी करती बाहर फलूदे मलाई की दुकान पर रखी रंगीन बोतलों कुल्फियों को देखती देखती सब कुछ चट कर जाती. इंजना घर से ही मुरली सरू को समझा डांट कर चलती और वे समझदार से बैठे रहते.  रुकमा कई बार पति से बाज़ार बीच चलते चलते झगड़ भी चुकी है कि अपने बच्चों के लिए छोटे मोटे खिलौने ले आते हो बाकी सालियों पर दिल आए तो दस दस बीस बीस उड़ा कर टूर पर जाते हो. इधर कभी कभी इंजना-मुरली के पिता क्या करते कि फलूदे मलाई के दो प्याले और ले लेते, और एक एक मुरली-सरू व चेतन-सैजू को देते. कभी इंजना से कहते एक एक चम्मच कर दोनों को बारी बारी खिलाओ कभी खुद चेतन-सैजू को ऐसे ही खिलाते. वो दिन बाकी बचे इन चारों बच्चों का त्यौहार सा हो जाता. घर पहुँचते तो सब के मुंह मीठे होते...
... सिविल हस्पताल एक बड़ी सी बैरक में है. प्रवेश कर के कई पलंगों व ज़मीन पर लगे बिस्तरों को पार कर के बढ़ते चले जाओ और लीलां का बिस्तर खोजो तो दूर बेढंगी सी खड़ी ताड़का दिखती. कभी चौड़े से घेरे वाली फ्रॉक के किनारे को नीचे करती करती घुटनों को ढकती बैठती जैसे बैठने की तमीज सीख गयी ही, और छोटी सी गेंद को उछाल उछाल कर ज़मीन पर फ़ैली पत्थर की छोटी छोटी गिटकियों से अकेली ही खेल खेलती.. कभी माँ के पलंग के सिराहने बेढंगी सी ही टिक जाती. माँ से बातें करने के बहाने खोजती. कभी दाई आती तो दाई से ही अपनी जाहिलाना दबंग सी आवाज़ में पूछती – ‘तू मेरी माँ का ख्याल रखती है कि नहीं...’ और लीलां को उस हालत में भी अपनी बेटी के जाहिलपने पर हंसी आ जाती. दाई को पता है, यह ताड़का है, सो ज़बान कैसे लड़ाती भला. इधर रुकमा आती या इंजना, सबके सर पर यही चिंता सवार रहती किसी ने लीलां को बता तो नहीं दिया, उसका पति गुम हो गया है. सबको ताड़का पर आश्चर्य है, यह ऐसी जाहिल सी लडकी कैसे इतना  बड़ा राज़ सीने में छुपाए है, माँ को गलती से भी नहीं बताती बापू आजकल फिर भाग गए हैं. वे दो नंबर के राशन ऑफिस के बाहर फुटपाथ पर बनियान जुराबें बेचते हैं. बेवकूफ किस्म के हैं, सो पटरी के दूसरे दुकानदार उनसे पैसे टीप लेते हैं. उस उल्हासनगर नाम के कसबे को सिंध में फैले दंगों के बाद आए सिंधी शरणार्थियों को बसाया जैरामदास दौलतराम  नाम के नेता ने.  भगवान उसका भला करे. बेचारे ने दिन रात एक कर दिए. उधर वीसापुर, लेकबील भावनगर न जाने कहाँ कहाँ रिफ्यूजी बसाए. पर वो बेचारा इन सबको केवल माचिस की डिब्बियों जैसे छोटे छोटे घर दिलवा सका, क्लेम ऑफिस से. सिंध में छूट गयी आलू प्याज़ की बोरियां, बड़ी बड़ी हवेलियाँ, काजू बादामों से भरी जेबें, वो खुद मुख्तियारकार वो नौकर चाकर. अब यहाँ खाने के लाले पड़ गए हैं. सब खाली हाथ भाग आए जानें बचा कर, अब भी खाली हाथ हैं. एक एक रोटी पर घर के चार चार बच्चे झपटते हैं. भागी के पिता अक्सर लुटे पिटे से रहते हैं, घर आ कर लीलां एक रुपए का भी तकाजा करे तो अपने दाहिने हाथ से खुद अपने चेहरे को ही बुरी तरह पीटते चले जाते हैं, कभी लीलां को ही दो चार जमा देते हैं और कभी गायब.
आखिर वो दिन आता है कि ताड़का पूरे सिविल हस्पताल के फ्लोर पर एक भूकम्प सा मचाती दौड़ भी रही है,  खुशी से खिलखिला भी रही है – ‘मेरी बहन हुई... मेरी बहन हुई... हा हा हा हा...’ पलंगों पर लेटी या उठ बैठी औरतों की हंसी ही न रुके, इस जाहिल लड़की के अंदाज़ पर.
लीलां घर आ गयी है, और आखिर उसे बता ही दिया जाता है, भागी के बापू कई दिन से गायब हैं. इधर इसी कारण रुकमा का घर एक अजीब सी मुसीबत में फंस गया है. अब जब तक भागी का बापू मिले तब तक उधर भी राशन पानी का खर्च करो. रुकमा को लगा जैसे बर्बाद हुई जाती है वह. यहाँ तीन सगी बहनें हैं, दो तो लीलां और रुकमा. तीसरी उल्हासनगर एक में रहती हैं. कहने को बहनें हैं, एक दूसरे के लिए जान देने वाली. पर गरीबी ने अच्छा दुश्मन बना दिया है एक दूसरे का. यहाँ यह भी एक बच्चों का अच्छा टशन है कि उधर अपनी माँ से रूठ कर इधर मौसी के यहाँ ही आ जमे. मौसी किचन में छुप छुप कर अपने पेट जाए बच्चों के मुंह में निवाले ठूंस ठूंस कर खिलाती और ज़बरदस्ती उनके पेट भरती. फिर नकली प्यार से उस रूठे हुए बच्चे को भी बचा खुचा परोस देती. पर अब तो रुकमा पर उस पूरे कुनबे का बोझ आन पड़ा है, राशन वाले का बिल बढ़ता जा रहा है. ताड़का के बापू की खोज अब इंजना के पिता टूर से लौटें तो हो कहीं...
इधर उल्हासनगर एक में रहने वाली सबसे बड़ी बहन ड्रामेबाज़ सी है. हेमा आती है तो अब तो लीलां या रुकमा को कोई उम्मीद नहीं कि वह मदद को एक टका भी इधर भूल कर फेंक जाएगी. बल्कि वह चिल्लाने लगती है और सबको डांटती हुई ऐसे दिखाती है जैसे पूरे खानदान में वही एक समझदार है, यहाँ तो सब एक से बढ़ कर एक मूर्ख भरे हैं. पर कभी कभी ताड़का अच्छा भला ड्रामा खड़ा कर देती है जो हेमा के ड्रामे से भी बढ़ कर होता है. हेमा जब चीख चीख कर लीलां रुकमा को डांटती है तब चेतन और सैजू क्या करते हैं कि डर के मारे माँ की बड़ी सी चारपाई के नीचे छुप जाते हैं. उधर इन्जना अपने दोनों भाइयों को संभाले बहुत धैर्य से बैठी रहती है. हेमा मौसी आखिर में निकलेगी तो ले दे कर वही भिखारियों वाली एक चवन्नी बच्चों को पकड़ा जाएगी  जिसके एक तरफ एक शेरनी छपी है. पर असली शेरनी तो ताड़का होती जो क्या करती कि घर के पिछ्वाड़े वाली तीन पौड़ियों से जो छोटी सी दीवार पौड़ियों की साईड में बनती है उसी में छुप कर हेमा मौसी की नक़ल करती है. हेमा चिल्लाती है – ‘भागी तो निभागी है कहीं की...’ और हेमा को बुरी तरह  चौंकाती ताड़का की आवाज़ आती – ‘तू निभागी है तू...’ हेमा चिल्ला पड़ती है – ‘हैं!...’ ताड़का – हैं...’ हेमा इस चिढ़ाती आवाज़ को खोजती अचानक पिछवाड़े वाला दरवाज़ा खोलती है – ‘कहाँ है री तू. मुझ पर चिल्लाने का नतीजा जानती है तू...’
-         ‘तू... तू जान मुझ पर चिल्लाने का नतीजा...’ कहते कहते ताड़का मोटी छलांग सी मार कर इधर इंजना के घर वाली पौड़ियों के पीछे जा छुपती तो इंजना जो क्षण भर को झाँकने आती तो उसे बहुत जोर की हंसी आ जाती. अन्दर से बेटी को हंसती देख रुकमा की  भी हंसी न रुकती. वह अपने घर के पिछवाड़े वाला दरवाज़ा खोल भागी को इशारे से अन्दर बुला लेती और खुद चक्कर लगा कर सामने वाले दरवाज़े से लीलां के घर जा कर हेमा को किसी प्रकार रोकती – ‘जाने दे बच्ची है सीख जाएगी...’ पर हेमा संतुष्ट न होती और रुकमा की सफलता इसी में कि आखिर हेमा को ठंडा कर ही छोड़ती. बड़ी सी चारपाई पर अपनी नवजात बच्ची को गोद में थाम इतनी देर लीलां कैसी घुटन महसूस करती अपनी हंसी को रोके रहती इस का वर्णन मुश्किल. लीलां पूरी हथेली ही अपने होंठों के ऊपर दबा कर अपनी बिटिया के साथ आँखों आँखों ही हंसती बैठी रहती. आखिर हेमा अचानक नीचे उकडू बैठ जाती तो चेतन और सैजू सहम से जाते. हेमा क्या करती कि चेतन को बाहर खींचने लगती - ‘क्यों मुए, मैं कोई राक्षसिनी हूँ क्या कि चारपाई के नीचे छुप जाते हो?’ ऊपर बैठी लीलां से अब न रहा जाता, हंसती खिलखिलाती ऊपर से ही चिल्लाती – ‘खेल रहे हैं दोनों, जाने दे हेमा मैं कहती हूँ...’

अचानक सैजू वहीं भीख की तरह हेमा द्वारा फेंकी हुई वही शेर वाली चवन्नी फर्श पर देखता और उसे झपट लेता. चेतन सैजू आपस में उलझ जाते. हेमा दोनों  बहनों से लिपट जो आंसुओं की धार बहाती वह दोनों को आज तक न पता चलता कि नकली है या असली. बाहर ताड़का आखिर सूंघ जाती कि हेमा मौसी रफादफा हो चुकी है. तब ताड़का भूकंप फैलाती दौड़ती फलांगती घर आती और सबसे पहले सैजू चेतन को निकाल उनके हिस्से आयी चवन्नी झपट कर अपने कब्ज़े में करती.

आखिर ताड़का का बापू ढूंढ लिया गया जब इंजना का बापू टूर से लौटा. इंजना के बापू ने एक झापड़ रसीद किया उसे और गुस्से में साथ के अपने घर चला गया. पर घंटे भर बाद उधर से आवाजें आयी जिस से लगा ताड़का का बापू खुद अपने चेहरे पर ही भारी भरकम हाथ मारे जा रहा है. रुकमा और इंजना के बापू घर बैठे रहे. पर सुबह पता चला कि दरअसल ताड़का का बापू खुद अपने आप को ही इसलिये पीटने लगा कि तूने अब फिर एक और बेटी पैदा कर दी. मर साली मर... भैन...’

दिन ऐसे ही सरकते रहे. साधू बाबा का घर कहीं उल्हासनगर पांच में है. कभी कभी वहां उसके भक्तजनों की अच्छी रौनक सी लग जाती है. लोग झूम झूम कर गाते हैं. आँखें मूँद विलीन से हो जाते हैं. पर आज का प्रमुख आकर्षण यह कि ताड़का औरतों के एक बड़े से गोले के बीच ऊंची ऊंची छलांगें मार नाचे जा रही है. भजन के बीच उसकी भोंडी सी आवाज़ भी अच्छी ही लग रही है जाने क्यों. औरतें एक दूसरे के कान में फुसफुसा रही हैं – ‘पास हुई है लीलां की बेटी भागी. कहती है मैं क्लास की लड़कियों में सातवें नंबर पर आयी हूँ मौसियो... सब हैरान थे मैं कैसे पास हो गयी सातवीं में. अरी सुन तो, तू क्लास की लड़कियों में सातवें नंबर पर आयी, पर क्लास में कितनी लड़कियां हैं चालीस? हा हा.. नहीं मौसियो मेरी क्लास में तो न सिर्फ सात ही लड़कियां हैं. हा हा हा हा... और ताड़का झूम झूम कर धरती हिलाती है. कहती है, अब आगे तो मैं पढूंगी ही नहीं मेरा दिल नहीं लगता. माँ से कह के छोटी बहना की देखभाल में उसकी मदद करूंगी. और घर में ही पापड़ बेल बेल कर घर घर बेच आऊँगी, सौ सौ के पैकेट. साधू  बाबा की मेहर होगी तो...

और साधू बाबा की मेहर हो गयी, एक और ही तरीके से. सबने सोचा साधू बाबा इसे सीख देंगे, कमसे कम मैट्रिक तक तो पढ़. पर बाहर लीलां और रुकमा एक चारपाई पर बैठी अन्दर से आ रहे भजनों का रस ले रही हैं. साधू बाबा अपने कमरे में पल्थी मार भजनों की इस धूम का हिस्सा बने हुए हैं और मुस्करा रहे हैं. तभी एक लड़का आता है, रुकमा से कहता है – ‘साधू बाबा ने ये सोडा लेमन की बोतलें मंगाई हैं, आठ हैं, कहाँ रखूँ?’

रुकमा को इस बीच साधू बाबा खिड़की से ही इशारे से अन्दर बुलाते हैं, कहते हैं  - ‘ये जो लड़का आया है, इसे गौर से देखना.’ रुकमा बाहर आ कर लड़के से कहती है – ‘ये बोतलें साधू बाबा कह रहे हैं वहां पानी का मटका है, आधा भरा है. उसी पानी में रख दे फ़िलहाल. थोड़ी देर बाद आरती होगी फिर थोड़ा थोड़ा ठंडा पेय भी पियेंगे सब.’

पर लीलां की तो बुरी तरह हंसी निकल गयी. मटका काफी दूर रखा है और अन्दर से भजनों का शोर. वो लड़का कँवल क्या करता है कि एक चाबी से एक एक बोतल खोलता है और अन्दर बोतलों के सारे पेय मटके के पानी में उंडेलता जाता है, लीलां चिल्लाती है – ‘ए ए लड़के क्या कर रहा है तू. बोतलें बंद ही अन्दर रखनी हैं तुझे...’

और थोड़े ही दिन बीतते हैं कि ताड़का के घर जश्न सा हो रहा है. पानी में बोतलें उंडेलने वाला लड़का एक साड़ी लाया है और ताड़का रुकमा के कहने पर अन्दर जा कर हेमा की मदद से ही साड़ी बाँध आती है. पहली बार उसने पेटीकोट ब्लाऊज नाम की चीज़ें पहनीं. हेमा को देख देख ताड़का अकारण खिलखिलाती जाती है पर आज हेमा कुछ नहीं कहती. साधू बाबा ने कहा है वो बोतलों को पानी में उंडेलने वाला लड़का यहीं विट्ठलवाड़ी स्टेशन पर एक टीन के ट्रे में केक बेचता है. लोकल आते ही दरवाज़े दरवाज़े लपकता है. लोकल तो उसी समय चली जाती है पर फिर भी भीड़ में कमाई हो जाती है...

और थोड़ी ही देर बाद बाहर बरामदे में बैठे साधू बाबा के पाँव छूती ताड़का कमरे के धूम धड़क्के में आती है और साड़ी का पल्लू लहराती कँवल से पूछती है – ‘दद्दा, इसमें मैं अच्छी लग रही हूँ?’ पर आज सबसे ज्यादा खुश है ताड़का का बार बार गुम हो जाने वाला मूर्ख सा बापू, पर कोई उसकी खुशी में खुशी मिला कर उसकी तरफ देखने को तैयार ही नहीं, सो वह खुशी में ही गदगद सा खुद अपने साथ हँसता कभी अपनी मुट्ठी से होंठ ढक लेता है, कभी हटा देता है, या अकारण ही थोड़ा सरक कर कमरे की रौनक को ताकता रहता है...

Sunday, December 14, 2014

चाँद तनहा है आसमाँ तनहा...कहानी – प्रेमचंद सहजवाला



चाँद तनहा है आसमाँ तनहा...कहानी – प्रेमचंद सहजवाला

तीन मूर्ति पुस्तकालय तक पहुंचना यह मात्र तीसरी बार हो रहा था पर इस बार अच्छा फंसा. लोहिया हस्पताल के बाद उधर जाने वाली बस नहीं दिखी तो एक ऑटो में ज़बरदस्ती बैठ गया. पर ऑटो वाला भी मेरा उस्ताद निकला और बोला कि बस यहाँ ग्यारह मूर्तियों से आगे नहीं जाऊंगा और दाईं ओर मुड़ जाऊंगा. अपना सा मुंह ले कर उतरना पड़ा और बीस रुपए दे कर शहादत सी ओढ़ता मैं चल पड़ा पैदल. जब तक तीन मूर्ति भवन के मेन गेट के भीतर प्रवेश करूं और भीतर का लंबा रास्ता पार करता पुस्तकालय वाली इमारत की सीढियां चढूँ तब तक हालत पस्त थी. पसीने से तर-ब-तर था मैं...
गलियारे में कुछ सोफा सी दिखती आरामदायक बेंचें हैं पर सब भरी थीं कि उसी ने, यानी निवेदिता ने पीछे से आवाज़ दी थी – ‘सर, यहाँ बैठिये न!’
निवेदिता यानी बाद में जिसने कहा कि लोग उसे प्यार से निवी कहते हैं, मुझे जानती नहीं थी पर मेरी खस्ता हालत पर शायद उसे तरस आ गया था और मेरी थकी आँखों में उसने देख लिया कि कहीं सांस लेने को बैठना चाहता हूँ. मैं मुड़ा और दस कदम लौट कर उसके सामने खड़ा हो गया. निवेदिता सरक गयी. मुझे बहुत शर्म सी आयी कि ऐसे एक महिला के साथ मैं बैठा लंबी लंबी साँसें लूं और अपना थका हुआ थोबड़ा उसे दिखाऊँ. पर मेरे बैठते ही जब मैंने उसकी ओर देख थैंक यू कहा तब वह इस कदर दीप्त सी एक मुस्कराहट मुस्करा दी कि मेरी थकावट मानो उसने दूर कर दी. बाकी तो रुमाल से बस पसीना ही पोंछना था. कुछ देर ऊपर चल रहे पंखे की हवा ने राहत दी तो वह बहुत सुरीली मुस्कराहट मुस्कराई – ‘निवेदिता.’
एक बात यहीं बता दूं तो बेहतर. निवेदिता दीक्षित.. हाँ, यही उसका पूरा नाम था. कोई बला की खूबसूरत महिला नहीं थी. उसका चेहरा व बाकी जिस्म बल्कि सांवले से कुछ अधिक ही सांवले थे! उसके कपोलों से उसकी उम्र झलक रही थी, पैंतालीस से तो ऊपर होगी ही. मैंने अपना नाम बता दिया – ‘देवेन.’ उम्र मेरे चेहरे पर भी उतनी ही छलक रही थी, जैसे हमारे बीच कोई अदृश्य दर्पण भी हो और एक फीमेल टु मेल कन्वर्टर भी हो ताकि मेरा चेहरा उसी का बिम्ब लगे हालांकि वह औरत थी और मैं मर्द! हम उसी, पहली भेंट में ही दोस्त बन गए थे. थकान दूर हुई तो अंदर पुस्तकालय चले गए दोनों. मुझे तो ऊपर प्रथम तल पर लोकमान्य तिलक और गोखले के ज़माने के अख़बार देखने थे जो कि किसी प्रोजेक्टर स्क्रीन पर कोई रील फिट कर के बायोस्क्प की तरह अन्दर आँखें गड़ा कर देखने और पढने पड़ते थे. निवेदिता ग्राऊंड फ्लोर पर ही मुस्करा कर बाय करती वहां की अल्मारियों की लंबी क़तार में कहीं गुम हो गयी.  मैं तिलक का अख़बार केसरी पढ़ रहा था कि कंधे पर किसी का हल्का सा स्पर्श महसूस हुआ. उसी समय वहां का इंचार्ज भी आ कर बोला – ‘आधे घंटे का इंटरवल है. आप सिर्फ एक इशू और देख सकते हैं. फिर कल.’ निवेदिता मुस्करा रही थी जैसे उसे यह सब अच्छा लगा. बोली – ‘चाय...’
बाहर एक खुले से रेस्तरां में चाय पी दोनों ने, कुछ स्नैक्स वगैरह और दोस्ती...
*  *
बात कभी गाँधी और गोडसे की निकलती और मैं और निवेदिता यानी निवी लड़ पड़ते. निवी कहती – ‘मैं उच्च जाति के गुरूर से भरी ओर्थोडॉक्स ब्राह्मण महिला हूँ, हार्ड कोर ब्राह्मण समझे?...’
-         ‘और मैं दलित न होते हुए भी बाबा साहेब का शिष्य, गाँधी का चेला. कास्ट वास्ट मेरे लिए कुछ नहीं...’
कभी देखो तो गोत्र पर दोनों सड़क पर चलते चलते ही तू तू मैं मैं पर उतर आए हैं. निवेदिता – ‘गोत्र की पहचान ज़रूरी है. समझे?’ लड़ाई शुरू ऐसे हुई कि मैंने कहा था कि खाप पंचायतें एक ही गोत्र वाले युवक युवती को शादी करने पर मार देते हैं.’ निवेदिता जैसे चीख पडी – ‘कर्रेक्ट...’ उसकी चीख सड़क की पूरी चौडाई पर फ़ैल गयी जैसे दूसरी तरफ के फुटपाथ पर चल रहे लोगों ने भी सुन ली. उसी समय बस आ गयी थी और हम बस में थे. सीट पर साथ साथ बैठ नहीं सके और बोलने लगे, ऐसे कि जैसे बोलना तो धीमे धीमे चाहते हैं पर आवाज़ न जाने क्यों बस में फ़ैल रही है.... बहरहाल. हम उस दिन खूब लड़े थे और मैंने उस से कह दिया था कि ठीक है तुम्हें जैसे सोचना है सोचो, अब हम कल से नहीं मिलेंगे... ठीक है, मुझे भी किसी वैद्य बैद्य ने नहीं कहा कि मैं तुमसे मिलूँ समझे?
मैं दरअसल पहले तो कभी कभार ही तीन मूर्ति पुस्तकालय जाता पर अब कई दिन से निवी के कारण आ रहा था. मेरा पुस्तकालय था ब्रिटिश काऊंसिल लायब्रेरी. एक दिन पुस्तकालय में बैठा ‘द लास्ट डेज़ ऑफ़ द ब्रिटिश राज’ पढ़ रहा था कि मोबाईल की पीप बजी. बस उसके बाद कम से कम बीस एस एम एस अदल बदल हुए जिनका लब्बो लुआब यही कि हमें विचारों पर नहीं लड़ना चाहिए. इस से दोस्ती टूटती है. मैं वहीं आ रही हूँ बस, मना मत करना.
ब्रिटिश काऊंसिल पुस्तकालय की कैंटीन में आमने सामने थे दोनों और निवी जैसे पैच अप करने को अपने होंठों पर लगातार एक मुस्कराहट लटकाए थी. एक और बात कि निवी की नाक के नीचे का ज्यग्रफिया ऐसे जैसे कि बंदरिया वन्दरिया हो. उसके काले से होंठ यूं गोल गोल मुड़े से दीखते जैसे सीटी बजाना चाहती हो. उस गोल गोल होंठों वाले पोर्शन से नीचे एक संक्षिप्त सी ठुड्डी बस. सामान्यतः किसी का भी आकर्षण न हो सके, ऐसा मुखौटा. पर उसका उत्साह और खुद पर एक प्यारा गुरूर सा, यही थी निवेदिता, उर्फ़ निवी. आज जाने क्योंकर एक खुशामदिया सी मुस्कराहट उसके होंठों पर लटकी थी. मैं बहुत अच्छे तरीके से पेश आ रहा था उस से, और दोनों बातें करते करते कैंटीन की बहुत मीठी सी चाय भी सुड़क कर बाहर आए तो निवी बोली - ‘अब कब? कब मिलेंगे हम?’
-         ‘जब आप कहो. मैं तो अक्सर इसी पुस्तकालय आता हूँ और आप जाती हो तीन मूर्ति में, सो जब यहाँ आओ मिल लेंगे.’
और ठीक चौथे दिन हम मैकडोनाल्ड में बैठे थे. जनपथ जहाँ आ कर सी.पी. के सर्किल से मिलता है, उस के बहुत नज़दीक एक ब्लॉक में मैकडोनाल्ड में बर्गर वर्गर का खूब मज़ा लिया हमने. यहाँ एक बात हो गयी, मैंने क्या किया कि अपना स्मार्ट सा फोन ले कर एकदम सामने बैठी निवी की एक फोटो क्लिक कर दी. निवी क्षण भर पोज़ बना कर एकाग्रता से सामने देखने भी लगी, पर फिर अचानक बौखला भी पडी – ‘नो नो, डिलीट कर दो मैं कहती हूँ. आई डोंट लाईक दैट.’ और मैं हतप्रभ था, बोला – ‘ये लो. मैं कोई...’
-         ‘नो नो, मेरा मतलब यह नहीं कि तुम कोई बुरे व्यक्ति हो... पर... डिलीट कर ही दो. पर हाँ, एक मिनट मैं देख तो लूं वो फोटो!...’

अपनी फोटो मेरा स्मार्ट फोन हाथ में ले कर बहुत हसरत से देखती रही वो, जैसे अपने आप को दर्पण में देख रही हो. फिर क्या हुआ कि झटके से फोन मुझे लौटाती बोली – ‘डिलीट!’
मैंने तत्क्षण वही किया जो निवी महारानी ने कहा. बस डिलीट कर दी उसकी तस्वीर. इसके बाद निकले तो सोचा ऑटो करने की क्या ज़रुरत. आज वाकिंग का खूब मज़ा लेते हैं. मौसम अच्छा था सो सी.पी के गलियारों में चलते रहे. चलते चलते बोली – ‘आज तक आपसे तो पूछा नहीं कि आपके घर कौन कौन है. बताइए.’ मैंने कहा – ‘बस, छोटा परिवार सुखी परिवार. एक अदद पत्नी है, और एक बेटा. सरकारी विभाग में हूँ, ड्यूटियां एक दिन सुबह एक दिन दोपहर से. ऑफिस में बुद्धिजीवी माना जाता हूँ, घर में निठल्ला. मित्रों में एक आप ही तो हैं, मेरी बहुत अच्छी दोस्त...’
निवी मुस्करा दी, मेरी शैली पर.
फिर बोली – ‘आज तक आपने मुझसे तो पूछा नहीं, कि मेरे घर कौन कौन है. मैं कहाँ रहती हूँ. पूछो न.’
मैंने कहा – ‘रहने का तो एक दिन आपने कहा था कि नोएडा सेक्टर नाईन्टीन में रहती हैं. पर घर की बात कभी नहीं निकली.’
निवी बोली – ‘घर में सिर्फ माँ थी, वो चल बसी. अब मैं हूँ और मेरी तनहाई...’ अब तक हम रीगल वाला गलियारा पार कर के सेन्ट्रल न्यूज़ एजेंसी वाले गलियारे आ गए थे पर जब उस से भी बाहर थोड़े खुले में आ गए तो लगा जैसे निवी अपनी बात कहते कहते बहुत आहिस्ता सी चलने लगी है. जैसे मुझे अपने विषय में बताते बताते वह कुछ आर्द्र सी हो उठी है, या इसी धीमेपन को ले कर जाने कैसे वह जीवन बिता रही है. बोली – ‘पति थे. पर अब उनसे अलग हूँ, और अलग हुए पता है कितना अरसा हो गया है. बताओ?’
मैंने कहा – ‘लगता है काफी समय से अलग हो. सो तलाक लिया कि नहीं?’
बोली – ‘दस साल से अलग हूँ. कहता है कि तुम में कोई अपील नहीं है. हर बात पर झगड़ता. तलाक? मुझे कौनसी दोबारा शादी करनी है, जो तलाक लूंगी...’ मैंने बीच में ही टोका – ‘आपने ऐसा क्यों सोचा निवी. आपके आगे भी एक लंबी तनहा ज़िंदगी है. और वह? क्या उसे शादी नहीं करनी कि...’
निवी थोड़ी सख्त सी हो गयी – ‘जाने दो उस बास्टर्ड को. वह रोज़ औरत बदलता है. एक के साथ रहता भी है. शादी कर ली होगी उल्लू के पट्ठे ने... डोंट डिस्टर्ब यूअररसेल्फ ऑन दिस प्लीज़...’
एकदम शिवाजी स्टेडियम के बस अड्डे के बाहर खड़े थे. मौसम में एक प्यारा सा गीलापन तो था, पर मैंने कहा – ‘नोएडा जाना है न? वहां तो मेट्रो जाती है....’ निवी ने हाथ दे कर रोका – ‘मैं इतनी जल्दी घर नहीं जाती. अभी भी कहीं जा सकती हूँ. शाम सात से पहले मैं घर को रवाना नहीं होती. बाय...’
काफी कुछ पज़ल सा हो गया मैं. कहाँ जा कर समय बिताती है. पर सोचा जाने दूं, किसी के निजी जीवन में क्या पड़ना ज्यादा. पर उसे जाते जाते देख एक अहसास हुआ कि जिस तनहाई की वह बात कर रही है, वही तनहाई इस समय धीमे धीमे बस की तरफ बढ़ रही है. उसकी बस जहाँ मैं खड़ा था, वहां से काफी दूर थी, सो वह धीमे धीमे पहुंचे और बस में बैठे तो मैं जाऊं. वह मुझे इतनी दूर से बाय भी करेगी कि नहीं, मुझे संदेह था. पर हुआ यह कि जब वह अपनी बस के पास पहुँची तो पीछे मुड़ देखने लगी निवी. मैंने हाथ उठा कर बाय किया, इस विचार से कि वह विदा ले रही है, पर दरअसल वह तो मुस्करा रही थी, जैसे इतनी दूर से भी मुझमें गौर से देखने योग्य आखिर जाने क्या है, मैं तो साधारण सी शख्सियत वाला व्यक्ति हूँ. देखा कि निवी इस क्षण अपने कमज़ोर से लगते हाथ से इशारा कर के मुझे अपने पास बुला रही है. मैं तेज़ी तेज़ी से बसों की इस तरफ वाली लाइन को काटता अगली लाइन को भी काटता आखिर पहुँच गया निवी मेम सा’ब के एकदम सामने, मुस्कराने लगा मैं, निवी मेम सा’ब, जो पति से तलाक नहीं लेना चाहती क्योंकि उसे कौनसा शादी करनी है. निवी बोली – ‘सॉरी. दोबारा इतनी दूर से बुलाया. मैं यह कहना चाहती थी कि अब न मैं आपसे कब्बी भी किसी विचार पर नहीं लडूंगी. न गाँधी पर न गोडसे पर न गोत्र पर न खाप पर. मुझे क्या लेना देना है ह्म्म्म? ओके?’
मैंने कहा – ‘किसी बात को इतनी तूल दें ही क्यों हम? आप को अपने विचार बदलने ही हैं तो कन्विंस हो कर बदलो न. फिर हमारे बीच विचारों को ले कर जो खाई बनी वह तो शुरू शुरू की गर्मी थी न. ‘ निवी मुस्करा दी और मैंने संकेत किया तो चुपचाप बस की तरफ चेहरा कर के उसकी सीढियां चढ़ने लगी.
*   *
अगली बार निवी का इंतजार मैं पटेल नगर बस स्टॉप पर कर रहा था. निवी जब भी एस एम एस करती है तो दोनों कम से कम बीस तीस एस एम एस से पूरी चैट ही कर डालते हैं. कभी कहती है नया लैपटॉप खरीदना है, कभी कहती है जाने दो, बजेट नहीं है. पर आपका कोई पहचान का हो तो... कभी मैं उससे कहता हूँ कि लैपटॉप पसंद कर लो, लैपटॉप वाला ही आपके क्रेडिट कार्ड कंपनी से फोन पर बात कर लेगा और दोनों के बीच अंडरस्टैंडिंग हो जाएगी कि आपको हर महीने तीन चार हज़ार की क़िस्त चुकानी होगी बस. निवी एक दिन अचानक बोली – ‘मुझे एक बढ़िया रूम किराए पर चाहिए. इधर नोएडा बहुत दूर पड़ता है तीन मूर्ति से.’ मैं अक्सर सोचता रहा कि निवी पुस्तकालय में इतनी पुस्तकें क्यों पढ़ती है. पता चला कि उसे न तो कोई परीक्षा देनी है न ही कोई बुक वुक लिखनी है. वह तो महज़ बी.ए पास है. उसे दिन भर कहीं समय काटने को जगह चाहिए. निवी तो अगर नोएडा समय से पहले पहुँच जाए तो वहीं के मार्केट में ही कहीं भटकती रहती है. घर में जैसे कोई हौआ वौआ रहता हो, जो उसे खा जाएगा. सब कुछ खुद करती है निवी, खाना बनाना, बर्तन धोना, चाय... सिर्फ झाडू पोचे को कोई बाई है उसके. सो उस दिन पटेल नगर के बस स्टॉप पर वह किसी बस से नहीं उतरी तो आगे पैदल चलता पटेल नगर मेट्रो स्टेशन के खम्बों के आसपास टहलने लगा और मेरा मोबाईल बजा. गुस्से में बोली निवी – ‘देबू तुम कहाँ हो? मैं यहीं तो हूँ, तुम्हें देख पा रही हूँ. और हाँ, मैंने बस से आने को कहा था न, आयी मेट्रो से हूँ. सॉरी.’ ‘पर तुम कहाँ हो? मैं तुम्हें नहीं देख पा रहा...’ ‘हा हा हा हा... खा गए न गचका. ऊपर रोड से एकदम नीचे देखो, मैं ठीक तुम्हारे नीचे हूँ, जैसे तुम्हारे क़दमों में... हा हा...’ नीचे देखा तो जैसे मुझे असुविधा सी हुई. कुछ खफा सा भी हुआ मैं. निवी वो रही, नीचे मेन रोड के सामानांतर जा रही पतली सड़क पर एक एक फुटपाथिया पत्थर पर चढ़ कर ऐसे बैठी है निवेदिता दीक्षित द ओर्थोडॉक्स ब्राह्मण महिला जैसे मुझसे शरारत करने को छुप कर बैठी हो. उसके बैठने का अंदाज़ ऐसे जैसे जहाँ भी जाती होगी या बैठती होगी तो ऐसे जैसे सिमट कर खुद को ही खुद से छुपा रही हो. मैं ऊपर से बहुत प्यारी सी आवाज़ बना कर चिल्लाया – ‘निवी.’ उसने ऊपर देखा और मुस्करा दी, जैसे उसने मुझे मज़ा चखा दिया हो. बहरहाल पंद्रह मिनट बाद ही हम साऊथ पटेल नगर की एक कोठी में सेकण्ड फ्लोर पर बैठे थे. ऊपर सेकण्ड फ्लोर की गैलेरी से मिसेज़ प्रूथी मुझे देख वेव करने लगी. मैंने नीचे से ही वेव किया और मुस्करा दिया. सीढ़ियों में मेरे साथ चढ़ती चढ़ती निवी बोली – ‘तुमने तो बहुत सी औरतों से दोस्ती रख रखी है भाई, सब जगह यही करते हो क्या? कोई आदमी भी दोस्त है तुम्हारा?’ मैंने कहा – ‘आदमियों के पास वो सच्चा दिल कहाँ, जो औरतों में है. हा हा... यह जो मिसेज़ प्रूथी है वह मुझे किसी पार्टी में मिली थी. तुम्हें किराए पर रूम चाहिए था सो इसी को फोन किया और इसके साथ तो इसकी दो बहुएं एक पोता एक पोती एक बेटा रहते हैं. दूसरा बेटा लैगोस में है. यहाँ उसके पास टेरेस में एक कमरा है. पूछते हैं कितना किराया लेती है...’
निवी चलते चलते रुक गयी और मेरी तरफ देखने लगी, जैसे पूछ रही हो – ‘दे देगी क्या? हाँ, तुम कहोगे तो...’ और वह शरारत से मुस्करा दी. मुझे भी कहीं जाने क्यों, अवचेतन में महसूस हो रहा था कि यह कमरा वमरा लेगी नहीं. यह यूं ही खुद को छलती रहती है शायद. वहां बहुत ऊब जाती होगी तो बतौर परिवर्तन के कभी लैपटॉप खरीदने की बात करती होगी कभी यूं ही किसी दोस्त के साथ कोई कमरा देख आती होगी. जाती वाती कहीं नहीं होगी यह, निवी, जो पति से तलाक इसलिए नहीं लेना चाहती क्योंकि इसे कोई शादी थोड़ेई करनी है. कहती है – ‘पति उल्लू का पठ्ठा सुबह शाम यही कहता है कि...
-          ‘कि तुम में सेक्स अपील नहीं है...’ मैं ने वाक्य पूरा किया तो एक मुक्का बड़े प्रयास से बना कर मेरे कंधे पर दे मारा – ‘धत्त, मैं बोली क्या सेक्स... मैं सिर्फ अपील बोली...’ मैंने कहा – ‘बाकी तो कॉमन सेन्स है न...’ निवी उस घुमाऊ सीढ़ी पर मुड़ कर आक्रान्त सी हो गयी – ‘चलो मैं वापस जा रही हूँ. तुम बैठो इसी प्रूथी की बूथी देखते रहो बस, और इसी की सेक्स अपील...’ और निवी मूर्ख औरत का ध्यान ही नहीं गया कि प्रूथी तो ऊपर जहाँ सीढियां ख़त्म होती हैं वहां का दरवाज़ा खोल मुस्कराती हमारे इंतजार में ही खडी है. निवी को कोई फर्क नहीं पड़ा शायद.
बस, प्रूथी के यहाँ भी समय ही कटना था. उसकी दोनों बहुएं मेरा मजाकिया स्वाभाव बहुत पसंद करती हैं सो हंसती हुई मेरे सामने आ बैठी. फिर प्रूथी ने अपनी बड़ी बहू से कहा दोनों को ऊपर का टेरेस दिखा लाओ. और बड़ी बहू एक और सीढी चढ़ा कर ऊपर टेरेस के सिंगल रूम में हमें खड़ा कर के कुछ देर नीचे ही चली आयी. मैं और निवी अकेले थे और मैं निवी के कुरते के कंधे को लापरवाही से अपनी जगह से सरका हुआ देख रहा था. और थोडा विचलित हो उठा था. निवी कमरे को ऐसे देखने लगी जैसे मुझे लेना थोड़ेई था, और मैं उसके करीब जा कर उसकी साँसों को आत्मसात सा करने लगा. अचानक मेरे मुंह से जो शब्द निकले तो निवी ने क्या किया कि मेरे गाल पर हाथ टिका कर बड़े हिंसक तरीके से उसे दूसरी ओर मोड़ दिया - ‘नतीजा जानते हो इन चीज़ों का? गेट अवे...’
मैं इस क्षण का नर्वस अब पटेल नगर मेट्रो स्टेशन पर निवी से कह रहा था – ‘आप उस लिफ्ट में जाओ. मुझे आपसे ऑपोजिट ही जाना होता है, सो उस तरफ की लिफ्ट में मैं जाऊंगा..’ निवी अपनी गाडी के प्लेटफॉर्म वाली लिफ्ट में घुस गयी, अन्दर कोई नहीं था सो मैं भी अकारण घुस गया और फिर कुछ अस्फुट सा बोलने लग कि निवी बाहर निकल आयी और मैं भी. मुश्किल से उसके गुस्से का सामना करता मैंने अगली बार उसे अकेले लिफ्ट में घुसने दिया और अपनी राह पकड़ता अपनी मेट्रो में चला आया. अब अगली बार मैं ब्रिटिश काऊंसिल लायब्रेरी में बैठा हूँ कि फिर शुरू हो गया एस एम एस चैट. निवी ने कहा – ‘आज तीन मूर्ति में बहुत अच्छा हिस्ट्री का प्रोग्राम है. तुम्हारे फेवेरेट ऑथर आ रहे हैं. एक से बढ़ कर एक... जैसे राजमोहन गाँधी, इतिहासकार मृदुला मुख़र्जी...’ मैंने कहा – ‘पता है. जयराम रमेश भी जा रहे हैं. पर मैं तो यहाँ बिजी हूँ न...’ निवी बोली – ‘आ जाओ न, इतने बड़े बड़े लोग आ रहे हैं. हिस्ट्री तो आपका भी पेशन है. कितना कुछ जानते हो...’ आखिर पहुंचना पड़ा. शाम छः बजे पहुंचा तो चाय चल रही थी एक बड़े से शामियाने में. निवी ने कहा – ‘वो देखो, कश्मीर द ट्रेजेडी ऑफ़ एरर्स की ऑथर, तवलीन सिंह, तुम्हारी एक और फेवेरेट...’ मैं जा कर राजमोहन गाँधी के आगे ऐसे झुका कि उसके पाँव छूना चाहता हूँ. पर वह मुस्करा दिया और मैं सीधे खड़े हो कर उस से बात करने लगा. दो घंटे खूब स्पीचिज़ हुई. मैंने अपने स्मार्ट फोन से बहुत क्लिक किया. बौद्धिक संतुष्टि हो तो मैं काफी सक्रिय हो जाता हूँ. फिर एक बार और चाय हुई. तब तक अँधेरा भी हो गया. बड़े बड़े ऑथर लोग चले भी गए. उनका खाना शायद किसी बड़े होटल में हो. हमारे लिये उसी शामियाने में खाना बनना था. जल्दी जल्दी खा कर आए क्योंकि बाहर बहुत हेवी खाना मुझे जंचता नहीं. आ कर बाहर रखी गोल मेजों के गिर्द रखी कुर्सियों पर बैठे निवी और मैं. निवी बोली – ‘बहुत फोटो खींचे? मेरी खींची कोई...’
मैंने गुस्से में कहा – ‘क्यों खींचूँ, फिर डिलीट करा दोगी.’
-    ‘हा हा हा हा...’
अचानक एक और बात याद आयी. उस दिन मैकडोनाल्ड में जब निवी ने गुस्से में कहा था कि मेरी फोटो डिलीट कर दो प्लीज़, तब तो सिर्फ उसी की फोटो डिलीट की थी. पर जब वहां से बाहर आ कर पैदल ही आगे बढ़ने लगे तो उसने एक बार फिर मेरे स्मार्ट फोन की डिमांड की. जैसे उसे अपनी फोटो की हत्या हो जाने का दुःख हो. फिर वह फोन की गैलेरी में कुछ और फोटोज देखने लगी तो अचानक फिर भड़क उठी. दो तीन और फोटो देख बोली थी – ‘ये सब क्या है? ये कैसी मॉडल्स मॉडल्स की तस्वीरें रखते हो मोबाईल में.’ मैंने कहा था – ‘मैं कम्प्यूटर से स्मार्ट फोन में डाउनलोड करता हूँ.  मॉडलिंग कोई बुरी बात थोड़ेई है.’ निवी कड़क आवाज़ में बोली थी – ‘डिलीट करो ये सब, ये क्या बकवास है.’ और मैं हतप्रभ. आज उसने अचानक मोबाईल मांगा तो उसकी ओर बढाते बढ़ाते हाथ रुक गया. खूब घबराया मैं. बिकिनी में ही दो मॉडल्स की तस्वीरें आज भी थीं उसी फोन में. कम्प्यूटर से डाउनलोड की हुई. एक तो ज्यादा ही कामोत्तेजक लग रही थी. मैं सोचता हूँ, मेरा मोबाईल मेरी पर्सनल आईटम है. मैं किसी को दिखाने के लिए थोड़ेई लेता हूँ कि कोई पोर्नोग्राफी दिखाने का इलज़ाम लगा दे मुझ पर. अब खयाल आया कि निवी तो बात बात पर नतीजों की बात करती है सो ये फोटो देख कहेगी कि महिलाओं को शरारतन ऐसी फोटुएं दिखाने की पता है कितनी जेल होती है. हाथ रुक गया तो निवी आक्रामक सी बोली – ‘दिखाओ मैं कहती हूँ. राजमोहन गांधी की ली कि नहीं? और अपनी दूसरी फेवेरेट तवलीन की?’ मैं अब घबराया सा बोला – ‘बहुत ली हैं. ऑडियेंस में आपकी भी है. पर एक दो और वैसी मॉडल्स की भी हैं. फिर तुम चिल्लाओगी, बोलोगी...’ और निवी खिलखिला पडी – ‘न न दिखाओ. मैं अब तुम्हें पहचान गयी हूँ. कुछ नहीं कहूंगी...’ और स्मार्ट फोन निवी के हाथ में था. उसने सब फोटो देखी, और फिर उन्हीं मॉडल्स को दूसरी तीसरी बार देख मोबाईल का स्क्रीन मेरी तरफ कर के टेढ़े होंठों से हंस पडी, पता न चला कि मुझ पे हंस रही है या खुद अपनी ही स्थिति पर. उसके बदन को आपादमस्तक जाने क्यों देख गया मैं, जैसे पूरा बदन कहीं जल कर खुद ही किसी शीतलता से शीतल होने के प्रयास में हो. हो सकता है, यह भी मेरी खामखयाली हो, सो मैंने एक प्रकार से अपनी सोच से समझौता सा किया और आगे सोचना बंद कर के कुछ क्षण बेवकूफों सा देखता रहा निवी महारानी को...फिर न सोचने का निर्णय ले कर भी यह सोचा कि उसे तो इन्हीं तस्वीरों में लुत्फ़ सा मिल रहा है, जैसे कि उसके बिना अपील वाले बदन में भी नीचे से ऊपर या उलट दिशा में कुछ रेंग सा रहा हो...जाने क्या हो, मैं इतने सायास तरीके से भला क्यों सोच रहा हूँ. और उस रात भी निवी की खरी खोटी सुननी पडी. बाहर निकल कर पुस्तकालय के बाहर के उस अँधेरे भरे रास्ते से निवी जैसे तेज़ तेज़ भागी जा रही थी, बोलती भी जा रही थी – ‘मैंने बहुत मिस्टेक की बताती हूँ. तुम्हें यहाँ बुलाया, तुम बहुत ख़राब आदमी हो...’ जिस गलियारे में हम बैठे थे वहां से थोड़ी दूर जो लोग बैठे थे चले गए तो मैंने निवी को नज़दीक के एक बेंच पर बुलाया कि यहाँ बैठते हैं, यहाँ हवा अच्छी आ रही है. निवी आ गयी. घुलमिल कर बातें कर रही थी. उसे मैंने बताया कि अभी कुछेक साल ही पहले न तीस हजारी कोर्ट की एक महिला वकील ने किसी बड़ी अंग्रेज़ी पत्रिका में पलथी मार कर मेडीटेशन में एक पूरे पृष्ठ पर छा जाने वाली तस्वीर अपनी दी थी. निवी बोली – ‘तो क्या? वो तो अच्छी हुई न?’ पर मैंने कहा – ‘तीस हजारी के सैकड़ों वकील एक दिन ‘बार’ में इकठ्ठा हो गए थे कि इस प्रकार हमारी एक वकील ने टॉपलेस मॉडलिंग कर के केवल एक अंडरगारमेंट में फोटो दी है. वकीलों ने मुकदमा कर दिया कि इस महिला ने वकील बिरादरी की नाक नीची कर दी है.’ निवी पर जाने क्यों, प्रतिक्रिया नज़र ही नहीं आ रही थी. मैंने कहा – ‘उस जज ने पता है क्या जजमेंट दी? कि ये सभी मॉडल्स हमारे देश की सांस्कृतिक राजदूत हैं, सो इन्हें पूरा सम्मान मिलना चाहिए. यानी दे आर अवर कल्चरल एम्बेसेडरस!’ 
दोनों एक ही बेंच पर बैठे थे कि लगा निवी को जैसे झपकी आ रही है, या फिर मेरी बात को नकारने की कोशिश में उसने झपकी को सायास ही बुला लिया हो.  मैंने क्या किया कि अपनी दाहिनी बांह से उसके कन्धों को घेर लिया कि निवी बिगड़ी – ‘हटाओ ये... हटाओ मैं कहती हूँ...’ मैं जिद पर. बोली, फिर वही डायलौग – ‘आजकल खतरनाक नतीजे हैं इस सबके. एक फोन कर दूंगी न, सीधे हो जाओगे पल भर में. ज़िंदगी बदल जाएगी आपकी...’ मैं बहुत ढीठ तरीके से मुस्कराया पर फिर खुद ही नर्वस सा हो कर हाथ हटा दिया मैंने. और अँधेरे में निवी वो रही, भागी जा रही है, मुझे कोसती. पर गेट पर बड़ा सा गोलचक्कर है, बहुत तीखी रोशनी वाली ट्यूबलाईटें. वहां रोशनी में निवी मेरे इंतजार में खड़ी मुझे हिकारत से देखने लगी और पास पहुँचने पर बोली – ‘वो रही आपकी बस... वहां उस स्टॉप पर. पहुंचोगे तो दूसरी आ जाएगी..’ मैंने मायूस सा कहा - ‘मैं ऑटो में जाऊंगा. पटेल नगर तक मिल जाएगा और वहां से मेट्रो...’ निवी बोली – ‘यहाँ ऑटो मुश्किल से मिलता है. कोई एक मिला तो मैं जाऊंगी उसमें.’ और एक ऑटो आया तो लपक कर बैठ गयी वह. ऑटो वाले से कहा – ‘चलो, राजीव चौक मेट्रो स्टेशन.’ ऑटो वाले ने किक लगाई कि उसे रोक कर मेरी तरफ देख तरस खाती सी बोली – ‘बैठो. राजीव चौक से भी आपको मेट्रो मिल जाएगी. जनकपुरी उतर कर विकासपुरी जाना होता है न...’ दोनों ऑटो में थे और दोनों घोर चुप. उतर कर सिर्फ अपने प्लैटफॉर्म की तरफ जाते हुए उसने मेरी तरफ बाय के अंदाज़ में देखा और घूरने सा लगी. फिर उसने अकारण आँखें बंद कर ली, जैसे फिर सायास एक झपकी को खड़े खड़े ही बुलाना चाहती हो. फिर हाथ मिलाने का एक अभिनय सा करती अपनी दिशा वाली मेट्रो के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी.
आज फिर वह ब्रिटिश काऊंसिल लायब्रेरी में एक लंबा सा एस एम एस चैट कर के आयी. मैंने उस से मजाक किया था कि एक साथ इतने एस एम एस कर के मुझे लगता है मेरी अंगुली स्मार्ट फोन को ही समर्पित है, जैसे एकलव्य का अंगूठा द्रोणाचार्य को मिला था. एक स्माईली मिली एस एम एस में और निवी मेरी लायब्रेरी में. वह कोई मुझे बता कर नहीं घुसी वरन मैं एक पुस्तक का पन्ना पलट ज़रा नज़र उठाऊँ कि निवी मेरे एकदम साथ वाली कुर्सी पर बैठी किसी पुस्तक के पन्ने में नज़र गडाए है. जैसी बुरी तरह दबी मुस्करहट उस दिन उसके होंठों पर थी, वैसी ही. मुझे पता ही न चला वह कब आयी और दबे पाँव इस पढने वाले हॉल में घुस कर मेरे ठीक दाईं तरफ वाली कुर्सी पर  बैठ एक पुस्तक पढने लगी थी. कुछ ही क्षण  बाद एक एस एम एस – ‘चलो, फीलिंग बोर.’ दोनों लायब्रेरी से बाहर. एक ऑटो में. ‘कहाँ चल रही हो?’ ‘मैकडोनाल्ड’.

कहते कहते निवी जाने क्यों, मेरे करीब आ कर मुझसे सट सी गई, मैं हैरान. ऑटो अभी एल आय सी की विशाल  इमारत के बाहर से आगे बढ़ रहा था कि निवी को जाने कैसे एक अटैक सा हुआ कि मुझसे चिपके चिपके ही उसने मुझ पर ही अटैक कर दिया. मेरी पीठ को घेर उसने चलते ऑटो में मुझे बुरी तरह कस लिया. मैं हैरान था. नतीजों की याद आने लगी, पर यह... जैसे उसकी नैसर्गिकता स्वाभाविक होती हो और मेरी मुजरिम सी. निवी ने उस शाम मुझे बुरी तरह अपने कब्ज़े में कर लिया. मैकडोनाल्ड तो अभी आगे शिवाजी स्टेडियम के साथ वाले ब्लॉक में था पर रीगल के सामने पड़ते ही निवी ने ऑटो रुकवा दिया. छलांग लगाई और बीस रुपए ऑटो वाले को दे कर मुझे हाथ पकड़ बाहर घसीटने लगी. उसके जिस्म पर मानो आक्रमण सा हो गया था. और मैं हतप्रभ उसकी गिरफ्त में था. रीगल के बाद वाली रेड लाईट पर जैसे उसी ने सारा ट्रैफिक रोका था. मेरा हाथ पकड़ खींचती हुई वह एक हीरोइन की तरह सड़क की चौडाई पर लगभग दौड़ने सा लगी. दोनों अब पालिका बाज़ार के ऊपर वाले पार्क में थे. ऊपर घोर बादल छाए हुए थे जैसे निवी की आदिमता ही ऊपर उड़ कर आसमान में छा गयी और उसे एक शिकार के रूप में मैं मिल गया था. उस सुखद या जाने एक अजीब उदासी सा पैदा करते गीले माहौल में चारों तरफ अपने आप में गुम जोड़े थे जिन्हें दुनिया जहान की कोई फ़िक्र न थी. वे एक दूसरे से मिल एकाकार से हो गए थे. हमें कोई जगह ही नहीं मिल रही थी. आखिर एक ढलान से फिसल कर एक छोटे से वृक्ष के तले जब हमें जगह मिली तो हम भी सुध बुध खो बैठे. निवी मुझ पर आक्रांत थी. कहा भी मैंने – ‘आज क्या हुआ है? नतीजे सोचे हैं इस सब के?’ ‘हा हा हाहा... निवी का आदिम सा लगता बंदरिया सा चेहरा बड़ा सा हो गया. अँधेरे की कई परतें नीचे उतर निवी के ही कहने पर जैसे हमें ढक रही थीं. निवी बहुत धीमी आवाज़ में मेरी आँखों में अपनी हवस भरी आँखें गड़ा कर बोली – ‘चुपचाप लेटे रहो. आज मैं होश में नहीं. आज मैं नीचे नहीं, ऊपर हूँ. आसमान मेरे नीचे है... हा हा हा हा...’ निवी ने मेरे कपोलों पर अपने  आक्रामक होंठों से एक जाला सा बिछा दिया. उसका और अब मेरा भी पूरा बदन जल रहा था और हम एकाकार थे. हमें तो होश भी न रहा कि अचानक हल्की हल्की सही, बरसात की फुहारें पड़ने लगी हैं और जोड़े उठ उठ कर जाने भी लगे हैं. हम दोनों के जिस्म उस अँधेरे में जल से रहे थे और निवी थी कि जैसे उस आदिमता में भी वही आध्यात्मिकता लिए थी जो उस जज को उस टोपलेस मॉडेल में नज़र आयी होगी जो आँखें मूँद अपने चित्र को देखने वालों के भीतर भी वही आध्यात्मिकता संप्रेषित कर रही थी... अब निवी भी जैसे एक कल्चरल एम्बेसेडर लग रही थी,  नतीजे वतीजे कुछ नहीं उसके लिए... हा हा... हा हा हा हा ... निवी की तन्हाई जैसे बेबस थी, उसका जिस्म जैसे गा रहा था – ‘चाँद तनहा है, आसमां तनहा...दर्द मिलता कहाँ कहाँ तनहा.....’ बहुत फुहारें पडी हम पर और कोई आसपास चलता हुआ बेवजह चिल्लाने भी लगा, तब जा कर निवी ने मुझे छोड़ा. मैकडोनाल्ड में बैठे थे दोनों, पर निवी चुप चुप थी, जैसे जाने क्या सोच रही हो, जैसे अभी अभी उस के साथ कोई ट्रेजेडी घट गयी हो. और मैकडोनाल्ड से जल्दी निकल कर बुत सी बाहर गलियारे में चलने लगी निवी. जैसे जिंदा ही न हो. एक खामोश सी काया हो जैसे. जैसे अब इसके साथ जो भी करूँ, यह हिलेगी डुलेगी तक नहीं. शिवाजी स्टेडियम पर भी अँधेरा ही अँधेरा था. गीलापन हम दोनों के जिस्मों से चिपक रहा था. पर वह बुत ही थी, जाने जिंदा थी कि... उसे यहीं इसी कॉर्नर से बस पकडनी थी अब. सो मैंने क्या किया कि उसके पूरे जिस्म को झकझोर कर अँधेरे का फायदा उठा कर उसके कपोल को चूम लिया और बोला – ‘बाय.’ तेज़ी से मुड़ गया मैं और सिर्फ एक बुत से निकली आवाज़ आयी, बाय. फिर कभी न मिलना मुझसे.... और मैं चला आया था. निवी उसके बाद मेरी कोशिशों के बावजूद मिली नहीं थी. अब मैं तीन मूर्ति पुस्तकालय कभी नहीं गया, और वह ब्रिटिश काऊंसिल लायब्रेरी कभी नहीं आयी. 

Thursday, July 24, 2014

ब्लॉग - कहानी प्रेमचंद सहजवाला

ब्लॉग
कहानी - प्रेमचंद सहजवाला
('दूसरी परंपरा' जून-अगस्त अंक में प्रकाशित)

मिल गया. खूब खोजा और मिल गया.
उस से फ्रेंडशिप भी हो गयी. बातचीत भी. और लो, अब मेरी कार फर्राटे से दौड़ रही है.
कार चलाती हूँ तो रिदम से पर आज रिदम भी वही खोज रही हूँ जो उस दिन की म्यूजीकल शाम में था. याद है सारी ट्यून. पर भला कार कैसे संगीत की कोई धुन चुन कर उस पर चलेगी. ह ह ह ह...रिदम तो मेरे अन्दर है न! सोच रही थी यह अंधेरी सी लगती सड़क सबसे अच्छी है, जैसे वो आ के बैठेगा अभी कार में मेरे साथ. फेसबुक पर तो बाद में खोज निकाला, पहले तो वह उस दिन की म्यूजीकल शाम में दिखा था न. और मैं मुग्ध थी उसकी शख्सियत पर. खुद को समझाया भी, मैरीड औरत हो करमजली उसे बस दोस्त बना. और अभी तक तो फेसबुक पर ही बनाया है न!

ट्यूब लाईटें ख़राब हैं, अच्छा है. ज्यादा ट्रैफिक भी नहीं है.
मैं कार को बहुत प्यारी सी स्पीड से फिसलाती जा रही हूँ. कार को  किसी ने हाथ दिया. काफी दूर से ही देख लिया, उस तक पहुँचते पहुँचते ब्रेक लग गयी आखिर. कौन है बदमाश! सोचा ज़रूरी तो नहीं न कि बदमाश हो. कोई मुसीबत का मारा भी तो हो सकता है. कार की खिड़की का शीशा ज़रा नीचे कर के पूछा, बल्कि पहले तो उसे इस तरह देखा जैसे मैं इस प्रकार कार रोकने वाले को एक हिकारत ही समझती हूँ. उसकी तरफ व्यंग्यात्मक सी एक दृष्टि डाली और अकारण होंठ भी टेढ़े कर दिए जैसे उसे चिढ़ा रही हूँ. अगले ही क्षण कार फिर चल पड़ी और मैंने हथेली के इशारे से उसे ऐसे दफा होने को कहा था जैसे सचमुच कोई चोर उचक्का हो वह. कह रहा था यहाँ तक ऑटो में आया और ऑटो ख़राब होने की बात कह कर ऑटो वाला चला गया. धत्त! मैंने कोई ठेका थोड़ेई लिया है किसी की मदद का. मेरी कार है... यह सब जैसे पलक झपकते ही हो गया था क्योंकि मुझे तो उस होटल पहुंचना था न, जहाँ उस संगीत निदेशक और इसीलीये मेरी दोस्ती की लिस्ट में शामिल हो चुके मेरे नए दोस्त से मिलते ही दोस्ती का हाथ बढ़ाना है मुझे. मेरे खूब दोस्त हैं. फेसबुक पर तो तीन हज़ार तक पहुँच गयी हूँ. पर संगीत कार्यक्रमों और दूसरे साहित्यिक कार्यक्रमों में जा जा कर कई दोस्त बन गए हैं. अरे सहेलियां भी बन गयी हैं भाई पर लुत्फ़ तो दोस्त में है न. पर अक्सर इस बात के बारे में सोच कर खुद से ही चिढ़ सी जाती हूँ कि ये सबके सब दोस्त कैसे बाबू टाईप हैं.  मैं तो सबकी खिल्ली उड़ा कर बड़े व्यंग्यात्मक टोन में बतियाती हूँ दोस्तों से. कोई कहता है, प्राऊडी है, ह ह...मैं तो बहुत घमंड वाली हूँ न, आला तहजीबो-तमद्दुन वाली. अपने सा किसी को कुछ समझती नहीं. सब मानते हैं कि हम तो थैले लटकाए आ जाते हैं न साहित्यिक मुशायरों या कार्यक्रमों में, यह ऊंचे घराने की है. पैसा भी खूब है, कार कोठी भी.. ह ह...बहुत कम  में कुछ संजीदगी या आकर्षण सा नज़र आता है. और वह साला घोंचू! बच्चों सा किलकता रहता है और कोई न कोई दिलचस्प बात कहने को आतुर... ह ह...

और इस हैंडसम से दोस्त से फेसबुक पर थोड़ी सी बातचीत कर के चल पड़ी हूँ उस से मिलने. दोस्त एक हॉबी की तरह बनाए जाएं तो बढ़िया लगता है, यह नहीं कि कहीं भी ज़रा पहचान हुई कि लपक लिए पीछे...

कार ऐसी जगह पहुँच गयी कि लगा बस एकाध किलोमीटर बाद तेज़ रोशनियाँ आ जाएंगी.
खुद को ही कोसा – तो क्या हो जाएगा नाश्पीटी अगर रोशनी आ जाएगी तो.
पर कार धीरे धीरे कर के कानों में हैण्डफ्री ठूंसी और मोबाईल से उसी का नंबर मिलाया.
-    ‘हेलो ओ ओ’ जैसे गीत गा रही हूँ
-         ‘हाउ आर यू कर्ली !’ हा हा... मैंने कहा था कि मेरा नाम अलका है, तो बोला यानी जुल्फें न! मैंने हंस कर टाईप किया- ह्म्म. कर्ली हेयर.
हम्म. वैसे मेरे बाल कर्ली नहीं हैं, यूं ही, कर्ली कह कर जाने क्यों खुश हो लेती हूँ. दोस्त कहते हैं, अच्छा, चाँद सा मुखड़ा है. आँखें बड़ी सी और बाल खासे लंबे. सो क्या ज़रुरत...
-    ‘मैं ठीक हूँ जॉगी कहाँ पहुंचे हो तुम?’
-    ‘अभी तो साकेत पहुंचा हूँ और खूब ट्रैफिक है.’
मुझे अनायास लगा कि मुझे भी अब हेवी ट्रैफिक में होना चाहिए. मैंने कहा – ‘ये जो धोला कुआं रोड जा रही है न, वहां हूँ मैं तो. आराम से आओ मिल जाएंगे दोस्त.’
-         ‘हम्म. ज़रूर मिलेंगे.’ उसकी आवाज़ में खुनक सी है, जैसे मैं कोई बच्ची हूँ और वह मुझे आश्वस्त कर रहा है कि हम्म, ज़रूर मिलेंगे.
मैंने यूं ही एक लंबा सा पॉज़ दे दिया. साला... समझता क्या है खुद को. पर स्टीयरिंग को संभाल धीरे धीरे आगे बढ़ी तो उसकी और भी आधिकारिक सी आवाज़ आयी – ‘हेलो. खूब अँधेरा होगा न वहां, कभी कभी हो जाता है. और वो तुमने अपने एन.जी.ओ का क्या नाम बताया था?’ मैं पल  भर  में ही अपनी औकात पहचान गयी. वह तो उस दिन एक म्यूजीकल शाम... किसी ने सजेस्ट किया कि सी.पी. के सेन्ट्रल पार्क में ही है प्रोग्राम. कोई नेत्रहीन लड़के लड़कियों में से संगीतकार खोज कर चलाता है. उन्हें  बाकायदा संगीत का प्रशिक्षण देता दिलाता है. उसकी रजिस्टर्ड एन.जी.ओ है, और मैंने तो अभी एक एन.जी.ओ पैदा ही किया है. शौकिया सही, और उसे रजिस्टर नहीं कराया. सोचा नाम भी आज उसी से पूछ लूंगी. उससे कहूंगी तुम्हारे विशाल से समुद्र जैसे ज़हन में इस छोटे से ज़र्रे के लिए भी कोई नाम हो तो बता दो न प्लीज़. यह  भी कहूंगी कि तुम्हारा काम बहुत ठोस है, तुम्हारा एन.जी.ओ जेनुएन. मैंने अभी हलके से काम शुरू किया है. तुम्हारे पास संगीत के शिक्षकों की एक ऑनरेरी  टीम है और मेरे पास सिर्फ एक दो लटकी सी रहती सहेलियां हैं. अगर उस बच्चों से किलकते रहने वाले साले को कहूंगी तो वह भी फटाफट वर्कर बन जाएगा. पर मैं उस दिन एक बड़े से लॉन में उसका सारा कार्यक्रम, उसकी व्यवस्था, उसकी वेबसाईट बाद में देख कर दृढ संकल्प सी हो गयी कि मैं भी एक सॉलिड सॉलिड एन.जी.ओ खड़ा करूंगी.

सामने ही बाईं तरफ जाता मोड़ आते देख कार को कुछ क्षण और अधिक धीमा कर के मैंने उस से कहा – ‘एन.जी.ओ को नाम अभी देना है. अभी थोड़ा सा ही काम शुरू किया है. आप मेरे दोस्त बन गए हो न?’
उसकी आवाज़ अब रोबीली सी भी लगने लगी, बोला – ‘कोई डाऊट!’
-         ‘न न.’ और बाएँ मुड़ कर साईमन बोलीवर मार्ग पर आ गयी. यहाँ ट्रैफिक ही ट्रैफिक था, क्योंकि कुछेक गाड़ियाँ तो जिस दिशा से मैं आईं, उसी से चलती बाएँ मुड़ी थीं तो कुछेक उधर धौला कुआं से आती हुई दाहिने मुड़ी थीं.

इस रोड से आगे जाओ तो एक दो गोलचक्कर बाद पंचशील मार्ग पर ही अशोका होटल. मुझे तो उस से भी आगे वहां औरंगजेब रोड पृथ्वीराज रोड वगैरह पार कर ऐम्बेसेडर होटल पहुंचना है, जहाँ मेरा नया नवेला, बहुत रोबीला सा, गठीला भी लग ही रहा था तस्वीर से और इस सबके बावजूद प्यारा प्यारा सा ब्वॉय फ्रेंड... धत्त! दोस्त बनेगा. फ़िलहाल तो इधर दाहिनी ओर सुनसान सी रहती भगवान महावीर वनस्थली के बाहर से गुज़रने का ख्याल कर कार धीमी ही कर ली मैंने, जैसे अकारण  मस्ती में सी आ गयी हूँ. सोचा वह तो अभी दूर है. वह भी हो सकता है साकेत से क़ुतुब मीनार कार दौड़ाता उधर औरंगज़ेब रोड से ही पहुंचे. भगवान महावीर वनस्थली के भीतर सुनसान ही सुनसान रहता है और अँधेरा सा भी. और आज मेरी इस बॉडी को जाने क्या हुआ है कि अँधेरे ही अंधेरे में कार दौड़ाए रहना चाहती हूँ. जैसे अभी भगवान महावीर वनस्थली के अन्दर चली जाऊंगी. शरीर में ऊपर से नीचे तक कभी कभी जाने कैसा तो एक खरगोश सा ऊधम मचाता ऊपर से नीचे नीचे से ऊपर को दौड़ता फिरता है. ख़ासा ऊष्म भी है वह तो... और मेरी कार तो लो, पहुँच गयी है एम्बेसेडर होटल के बाहर. वो आता ही होगा. फोन कर के उस को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं बाबा. बड़ा रोबीला है, मेरा दोस्त. कार अन्दर कहीं जा कर पार्क भी कर ली मैंने, और कुछ देर बाद ही होटल के नर्म नर्म कालीन से ढके कॉरिडार पर थिरकती सी कदम उठा रही थी मैं...

*  *
स्नैक्स रूम में आमने सामने थे हम. उसे लगातार निहारते निहारते सोचा कर्ली हेयर तो इसके हैं. गोल मटोल चौड़ा सा मुखड़ा है. नहीं नहीं, बहुत गलत सोच गयी मैं इसके बारे में. कोई घमंड नहीं, रोब नहीं, अपना अपना सा है. अपने काम को प्रतिबद्ध होगा यह ज़रूर. मुस्कराता है, बल्कि कहूं कि मुस्कराता भी है. मुझे अब यह अच्छा लग रहा है कि वह बात ऐसे कर रहा है जैसे मुझे आश्वस्त कर रहा हो हर बात में, बल्कि जैसे मुझे प्रोत्साहित कर रहा हो हर सवाल पर, हर जिज्ञासा पर. इस बीच उसने अपनी पॉकेट से एक किंगसाईज़ सिगरेट की डिब्बी भी निकाल ली. क्लासिक. उसमें से एक सिगरेट को फ़िल्टर से बाहर खींच उसने अपने होंठों से लगा ली सिगरेट. फिर उसे जैसे थोडा देर से ख़याल आया हो, डिब्बी पर तर्जनी टिका दी और जैसे कैरम बोर्ड के स्ट्राईकर को थोड़ा आगे खिसकाते हैं, डिब्बी एकाध इंच मेरी तरफ सरका कर आँखों से सवाल किया – ‘आप पीती हैं? लीजिये...’
मैं थोड़ी सख्त सी बोली – ‘न न मैं नहीं पीती भई...’
वह  मुस्करा दिया. उसके गोल मटोल गालों पर जैसे वह मुस्कराहट लहरीली सी आवारागर्दी करने लगी.
जब उसने अपने लाईटर से सिगरेट सुलगाई और धुंए का पहला छल्ला हवा में उड़ाया तब अनायास ही मेरे पीछे हॉल की छोटी सी लंबाई पार कर जो दरवाज़ा आता है, उस तरफ देखने लगा. शायद कोई कपल अन्दर आया था. इस बीच मुझे जैसे शरारत सूझी. उसकी डिब्बी में से एक सिगरेट उस से बहुत चालाकी से नज़र बचा कर बाहर स्लिप कर ली. जैसे सिगरेट गुम कर के शरारत का मज़ा ले रही हूँ. सोचा यह यहीं कहीं छुपा लूंगी, पर मुझे क्या पता था कि वह सिगरेट अनजाने ही मेरे होंठों पर जा रुकेगी. उस की नज़र गयी तो थोड़ी खिसिया गयी मैं, बोली – ‘मैं पी लूं यह?’
-    ‘ओ वाई  नोट. पियो अगर पीती हो.’
मैंने अपना बचाव करते से कहा – ‘हैबिट नहीं है. बहुत ख़ास मौकों पर कुछ छल्ले उड़ा लेती हूँ.’
वह फिर वही आवारागर्दी वाली मुस्कराहट मुस्कराया. और मैं उसी के लाईटर से  सिद्धहस्त हाथों से सुलगाने की तरह सिगरेट सुलगा कर कश लेने लगी.

स्नैक्स आ गए.
प्लेटें दो उधर दो इधर.
छुरी कांटे भी. क्या था इस का क्या महत्त्व भला.

एन.जी.ओ की बात तो उसी ने निकाली.
मैं बहुत संकुचित हो रही थी. उसने बताया कि वह तो किशोरावस्था से ही गिटार, फिर वायोलिन का शौक़ीन हो गया था... पिता चल बसे थे एक एक्सीडेंट में. माँ है पर वह उसी फ़्लैट में नहीं रहती जिसमें वह रहता है. ऊपर उसी बिल्डिंग के दो तीन फ्लोर ऊपर उसने अपना अलग फ़्लैट खरीद लिया था बाद में. वह संगीत का एक महत्वाकांक्षी कलाकार. माँ बहुत खुश होती बेटे को देख देख कर.

उसने डी.यू से ही आनन फानन में इंग्लिश ऑनर्स भी कर लिया फिर एम.ए भी. पर यह सब उसे बहुत रुटीन लगता. बस, एक बार वह अपने कॉलेज के एक म्यूजीकल प्रोग्राम में शिरकत करने गया तो उसके कॉलेज में ही फिलॉसफी पढ़ा रहे संगीत गुरु ने उसे एक नेत्रहीन लड़कों की टीम दिखाई. उसमें कुछ तो अभी वोकल म्यूज़िक सीख रहे थे. एक दो बहुत ब्रिलियंट थे. अपने डी.यू के हिन्दू कॉलेज के हॉल में ही उसके संगीत गुरु ने उन लड़कों की एक आईटम की रिहर्सल कराई थी. उसके बाद जो प्रोग्राम उसने और उन दो नेत्रहीन लड़कों ने दिया वह हिट गया. ओर्केस्ट्रा था पर उसमें जैसे इसी, जॉगी की वायोलिन  प्रमुख थी बस. और उसके बाद धीरे धीरे उसका जीवन बदल गया. जो अपेक्षाकृत कम जानकार थे संगीत के, वे उसके यूनिवेर्सिटी छोड़ते ही शागिर्द बन गए. उसका एक ही सपना था. वह दुनिया से कुछ अलग करे. और यह एन.जी.ओ. दरख्शां रास्ते जो नेत्रहीनों के जीवन को दरख्शां (रोशन) करे.  

मैं सिगरेट के कश यह सुनते सुनते ऐसे लेने लगी जैसे मेडीटेशन में हूँ.
पहले उसके बोलने की आवाज़ पर मुग्ध, फिर उसका मुखड़ा देख फिर उसकी बातें सुन. अब मैं बहुत घबराई कि इस का एन.जी.ओ तो रजिस्टर्ड है और देखते देखते अब दिल्ली के सौ सवा सौ से भी अधिक नेत्रहीन कलाकार इसने इकठ्ठा किये  हैं. पांच छः संगीत के शिक्षक भी. जो भी पैसा सरकार से मिलता है उसे वह बहुत तन्मयता से इसी एन.जी.ओ में इस्तेमाल करता है. मैं डूबने डूबने सी लगी कि इस समुद्र से विशाल व्यक्ति के आगे मेरा यह पिद्दी सा एन.जी.ओ जिसमें कुल दस पंद्रह लड़कियां अपनी सुरक्षा के लिए जूडो कराटे सीखती हैं जो कि मुझे भी नहीं आते, क्या कर लेगा. पर उसने खुद ही इसकी बात निकाली. पूछा – ‘अब तुम अपना बताओ न कर्ली!’

-         ‘जॉगी मैं क्या  बताऊँ. अभी बहुत उत्साह वाले लोग ही नहीं मिले हैं. एक मास्टर आता है इन लड़कियों को सिखाने और एक लड़की है जो उतने ही उत्साह से काम करती है जितने उत्साह से शायद आपके वे नेत्रहीन लड़के लड़कियां करते होंगे. पिछले साल जो आन्दोलन हुआ न, उसी के बाद मुझे भी यह ज़रूरी लगा कि लड़कियों को केवल शारीरिक बल प्रदान न करूं, उन्हें मानसिक रूप से भी प्रबुद्ध बनाऊँ पर अभी तक तो मैं नाम ही नहीं सोच पायी. कुछ नाम बताओ न, और फिर...’

सिगरेटें ख़त्म हो गईं. वेटर एक ऐश ट्रे छोड़ गया था. उसमें दो सिगरेटों के दो टोटे आसपास पसर गए थे.

उसने कहा – ‘आपने कौनसे नाम सोचे?’
-    ‘मैं तो कुछ चलताऊ नाम ही सोच पायी, जैसे चट्टान, सुरक्षा वगैरह.’
वह खिल्ली उड़ाने के से अंदाज़ में हल्की सी ह ह कर बैठा, जैसे उस से गलती हो गयी हो. गंभीर हो गया. फिर बोला – ‘सोचूंगा. पर काम तो आगे बढे!’
-         ‘ह्म्म्म. इस पहाड़ सी शख्सियत के आगे मेरी हल्की सी हम्म भी जैसे जुर्रत थी मेरी.
*  *
उसका फ़्लैट तो फ़्लैट, उसकी पूरी बिल्डिंग ही खूबसूरत.
नोएडा से दिल्ली आया था मुझसे मिलने.
यहाँ तो बहुत डेवेलपमेंट हो गया है. एस.एम.एस ही एस.एम.एस आते हैं कि प्रौपर्टी खरीदो जी, लोन का बंदोबस्त हो जाएगा.

वहां एक घंटा जलपान हुआ और उठे तो जैसे उसकी अनेक बातों के ढेर मेरे सीने में जमा होते गए. उन्हें मैंने सहेज लिया और दोनों निकले थे उसी नर्म गुदाज़ कालीन पर प्यारे प्यारे से बल्कि अब कुछ नए नए से लगते कदम उठाते. अब तक दोनों के होंठों पर एक एक और सिगरेट सवार हो चुकी थी. मैंने उसे बताया कि हसबैंड जर्मनी में हैं और दोनों बेटियां अभी एक साल पहले इधर एम.बी.ए कर के दोनों ही एच.सी.एल में लग कर उसकी इंग्लैण्ड शाखा चली गयी हैं, मैं रह गयी निपट अकेली. यह भी एक ट्रेजेडी है न, जैसे तरक्की का साईड इफेक्ट हो. पति जर्मनी, बच्चे इंग्लैण्ड, पत्नी नई दिल्ली में पूसा रोड की कोठियों में. किसी दिन दोनों बेटियों में से एक को बेटर जॉब अमरीका में मिल गयी तो चारों प्राणी अलग. हा हा हा हा... जॉगी भी हंस पड़ा. बोला – ‘होता है, पहले घर में महफ़िल होती है फिर चारों जैसे द्वीप बन जाते हैं. पर बदलते वक्त को स्वीकार करना ही मैंने जीवन में सीखा है, वर्ना माँ क्यों कहती कि उसका अपना जीवन है सो वह एक ही फ़्लैट में रह कर सिर्फ मेरा खाना वाना नहीं बनाएगी. उसका अपना बिज़नेस है छोटा सा, वही चलाती है और उस से बाहर कुछ करना उसकी ऊर्जा से परे है.

फ़्लैट की यह बैठक देखेने के लिए चारों तरफ नज़र दौड़ाते दौड़ाते यह भी सोचा कि फैमिली मेम्बरों के अलग होते ही कैसी तो एक आवारागर्दी सी आ जाती है मन में कि कोई कहे चलो, तुम्हें नोएडा अपना फ़्लैट दिखा दूं, जहाँ दो कमरों में संगीत की कक्षाएं हैं और दो में मैं रहता हूँ. एक  बैठक और एक बेडरूम, और मैं चली ही आयी, उसकी कार के कभी आगे कभी पीछे को ड्राईव करती इस पहली ही मुलाक़ात की शाम में!

बैठक में एक से बढ़ कर एक नायाब पेंटिंगें हैं. किसी में जानवर तो किसी में आँखें मूँद सूफियाना से गीत गाता गायक, जो कीमती कालीनों पर बैठे आँखें मूंदे फ़ज़ा में संगीत की स्वरलहरियां लहराता है. लगा जैसे वह संगीत कमरे में फ़ैल गया है. देखते देखते सोफे के दो कोचों के बीच की मेज़ कुछ प्लेटों से भर गयी. काजू, नमकीन काजू, स्नैक्स और न जाने क्या क्या....
मेज़ पर कुछ और रखने की जगह ही नहीं बची. हाँ एक बड़ा सा ऐश ट्रे भी था, जिसमें यहाँ आने के कुछ देर बाद भी सिगरेट के टोटे एक दूसरे को कंपनी दे रहे थे. उसके दोनों संगीत के कमरे भी देख आयी. शो केसेज़ में प्यारी प्यारी सी गिटारें, वायोलिन, नीचे कालीन के किनारे सितार. कुछ नेत्रहीन लड़कियों की सितार बजाती तस्वीरें. आह! सब कुछ गज़ब का है यहाँ तो. वापस बैठक की तरफ बढ़ते बढ़ते उसने अनायास मेरे कंधे के गिर्द बांह भी रख ली फिर जैसे गलती का अहसास होते ही अलग छिटक गया. मैं कुछ इंच उस से दूर हुई और अपने आप को संजीदा करती साड़ी के पल्लू के एक कोने को ऐसे पकड़ा जैसे कोई चिड़िया जकड़ी हो और फिर हाथ को दूर तक ले जा कर पल्लू को पीछे घुमा कर पूरी पीठ ढक ली. दोनों के कदम अब आहिस्ता से उस दरवाज़े से बाहर निकले.

और कुछ ही देर में मैं जैसे यहाँ ऐट होम फील करने लगी. जैसे यह मेरा फ़्लैट हो और मेरा यह अनमोल सा लगता दोस्त मुझसे मिलने आया हो! मैंने अपनी बात निकाली और जैसे उस कमरे में छाई खामोशी जो किसी किसी क्षण प्यारी सी, मेडीटेशन वाली खामोशी से हट कर सनसनीखेज़ खामोशी भी लग रही थी, को सुनाती मैं अपनी एन.जी.ओ पर उतर आयी. उसने उसी क्षण बोला – ‘आप अपने एन.जी.ओ का नाम ‘अस्वीकार’ क्यों न रख दो!’
मेरी ज़बान से बहुत तेज़ी से निकला – ‘आप जो कहोगे. पर आपका सहयोग ज़रूरी है.’

उस अपनी सी लगती बैठक में मुझे जैसे किसी और चीज़ की ज़रुरत महसूस हुई सो मैं अनायास अपने दाहिनी ओर की दीवार पर चमकीले शीशे में फैले एक शोकेस की तरफ देखने लगी.

कुछ ही देर में यह प्रश्न उछला – ‘कौन सा? बी.पी? मेरे पास तीन हैं.’
मैं संगीतात्मक लय में बहुत धीमे से फुसफुसाई कि भगवान करे कि वह सुन ही न सके और मैं जल्दी से बाय करती चल पडूं. और उसने सुन लिया, जैसे हवा में खामोशी ने और गहरा हो कर उसे मौका दिया हो, मेरी सुरीली सी फुसफुसाहट सुनने का. टीचर्स. 

वह मेरी तुलना में कुछ तेज़ी से पी रहा था और मेरे लिए कमरे की फ़ज़ा जैसे एक अजीब नशीले कोहरे में बदलती जा रही थी. उसने तीसरा पेग भी लगभग ख़त्म किया और मैं अभी दूसरे पेग के अंतिम घूँट तक थी. मैंने यूं ही उस से पूछा, जैसे कि यहाँ, इस आला से माहौल में मैं अब क्या बातें करूं, यह सूझ ही नहीं रहा था, पर लगा जैसे इन अनमोल से लगते क्षणों में... यह अनमोल होने की संज्ञा भी मेरे चेतन में थोड़ेई थी, यह भी मेरे अवचेतन का कमाल था कि उचित मौका पा कर ही फ़ौरन अच्छे अच्छे शब्द या मुहावरे पकड़ा देता था, हाँ तो इन अनमोल लगते क्षणों में मैं इसी शख्सियत के समुद्र में गहरे पैठूं और इसे और अधिक और अधिक समझती जाऊं. जैसे कि यह अब से मेरी हॉबी होने वाली है. मैंने पूछा – ‘आप फायनांस कैसे पाते हैं? कोई नौकरी...’

-         ‘हा हा...’ वह फिर होटल की तरह एक गलती करने के अदाज़ में खिल्ली सी उड़ाता हा हा कर गया फिर उसे समेट गया.  बोला – ‘मेरे पास अच्छी नौकरी थी, अच्छा वेतन भी. तभी नौकरी के साथ यह काम थोड़ा थोड़ा शुरू किया. फिर नौकरी छोड़ दी और एक छोटी सी संगीत इंस्ट्रूमेंट्स की दुकान खोल ली जिस से कर्ली समझो...’ और ऐसा कहते हुए उसने एक इशारा सा किया कि अपना गिलास तो उठाओ, ऐसे छोड़ रखा है, और मैं गिलास के गिर्द अपनी अंगुलियाँ बहुत कलात्मक तरीके से रख कर उठाने का क्रम करती. जॉगी बोला – ‘सरकार मुझे एक से दो लाख तक डोनेशन देती है. बाकी जानती हो अपना बजेट मैनेज करने के लिए मैं क्या करता हूँ?’
मैं उस समय फिर शरारत के मूड में थी, सोचा मैं भी इसकी खिल्ली उड़ाऊंगी, कुछ कहूंगी, पर चुपचाप उस दूसरे पेग का आखिरी घूँट हलक से उतार मैंने एक और पेग अपने आप बना भी लिया और सोडा भी डाल लिया. उसने कहा, जैसे अब वह दो टुकड़ों में बंट गया हो, एक वह ऐय्याश सा जो बहुत आत्मविश्वास से पेग पी कर पूरी बैठक को नशीली धुंध से भर रहा है, अपने लिए नहीं, मेरे लिए, और दूसरे पवित्र से लगते टुकड़े से वह ज़रा अब तक तीन पैगों से आवाज़ में आ चुकी खुनकी से अलग एक देवता सा लगता बोला – ‘मेरे इस फ़्लैट की सफाई कौन करता है पता है? जो लड़का यहाँ सब करता था उसे दुकान पर लगा दिया और उसकी वह नौकरी अपने लिए मैंने ले ली. यह सारा शानो शौकत मेरे पिता का बसाया हुआ है जो मुझे सुपुर्द कर के माँ ऊपर रह रही है. मैं खुद ही कुकिंग एक्सपर्ट हूँ यहाँ और खुद ही झाडू पोचा...’ मुझे लगा मैं भी उसकी ही तरह गलती से एक छोटी सी हा हा न कर लूं, पर उसके लिए मन में श्रद्धा सी उत्पन्न हो रही थी और तीसरे पेग से शराब की बजाय वह श्रद्धा सी हलक से नीचे उतर रही थी. वर्ना इतनी देर लग रहा था कि यह शराबी संगीतकार और मैं शराबिन...अस्वीकार की संस्थापिका...
*   *
वक्त कैसे गुज़र गया यह मैं होश में होती तो भी शायद न पता कर पाती. चौथा पेग भर कर होंठों से लगाने से पहले ही मुझे चकराहट सी हुई. मैं उठ कर वाश बेसिन की तरफ लपकी. कुछ उल्टियाँ ही होने लगी. दो से ज्यादा कभी नहीं पीती मैं, पर आज... वाश  बेसिन पर पीछे मेरा संरक्षक. उसकी उपस्थिति से ताकत आयी और मैं मुंह साफ़ कर बाहर उसकी बैठक में ही टहलने लगी और बोली – ‘जब थोड़ा हेवी महसूस करती हूँ तो कमरे में टहल लेती हूँ. बहुत जल्द हल्की हो जाती हूँ. आई एम आलराईट नउ.’ कमरे में आगे पीछे की दस बार की चहलकदमी के बाद मुझे लगा जैसे बैठ कर अभी और पीने लग जाऊंगी. पर फिर बैठते बैठते सोचा नहीं, पीना अच्छी बात नहीं होती. ह ह ... और वो? वो तो  किचन में जा कर माईक्रोवेव में कुछ गर्म करने लगा और इधर गैस भी जला दी. मुझमें भी फुर्ती आ गयी. आवाज़ ही तो लड़खड़ा  रही थी.  पर वह मुझसे कॉम्पीटीशन में जीत गया. मतलब कि अब आगे बात क्यों बढ़ाऊं. कहानी तो दी एंड की तरफ बढ़ रही है न! मेरी कार नीचे उसी की कार के साथ पार्क की हुई है. पर अब...

अनकहे तरीके से ही तय हो गया कि मैं ड्राईव नहीं कर सकूंगी अब. और रात की वह नशीली धुंध जाने कब सुबह में ही बदल गयी तब आँखें खुली तो होश उड़ चुके थे मेरे. याद करने में ही अपना सर खपा दिया कि रात उसके बाद क्या क्या हुआ था. मैंने क्या कहा था और उसने क्या किया था. पर मेरा सर भन्नाने लगा यह देख कि मैं दूसरे कमरे के बिस्तर पर निर्वस्त्र हूँ. पूरी तरह... निपट... आसपास कोई नहीं. मेरे पैरों को ढकती एक गर्माहट सी देती चादर ज़रूर महसूस हुई. सोच रही थी बेहोश हो जाऊं तो यह सब देखने और इस पर सोचने से बच जाऊंगी. पर अचानक जॉगी प्रकट होता है और वह केवल एक वी शेप अंडर वियर में है. जॉगी ने तेज़ी से उस पूरी चादर को मेरे शरीर पर डाल कर मेरी अपनी वहशत को ढक दिया जाने अपनी वहशत को मान्यता दे रहा था वह मेरी नज़रो से. मैं कुछ और कर सोच पाऊं उस से पहले ही वह भी लपक कर मुस्कराता उसी चद्दर में छुप गया. दोनों के बीच एक युद्ध सा शुरू हो गया और मैं निकलने के लिए ऐसे छटपटाने लगी जैसे मेरे पास रिवॉल्वर होती तो उसे शूट कर के ही उठती मैं. बस...
अब ऊपर की जितनी भी कहानी थी मैंने ब्लौग में टाईप कर के उसे सेव किया और कम्प्यूटर शट डाऊन कर दिया. पर फिर झटके से जैसे क्षण भर में ख्याल आया तो कम्प्यूटर फिर ऑन कर दिया. फेसबुक में जा कर नीचे दी हुई चंद पंक्तियाँ अपनी टाईम लाइन में टाईप कर दी. फटाफट. जैसे ज़रूरी हों बहुत. मैंने टाईप किया – ‘मेरे दोस्त ने एक गुज़ारिश की. मैंने आँखें तरेर कर मना किया. पर उसकी इच्छा पूर्ण हो गयी. और हाँ, उसमें मेरी भी अनकही इच्छा शामिल थी. सोचती हूँ बहुत चाह कर भी क्या मैं उस अनकही को कही में बदल सकती थी!’
फेसबुक पर यह पोस्ट लिखने  या अभिव्यक्ति की आवारगी की तरह डाल कर वापस अपने ब्लौग पर आयी मैं. ऊपर तो सब कहानी थी न. मैंने फेसबुक वाली ही पंक्तियाँ उतनी ही आवारगी से बहुत फुर्ती से टाईप कर के इस छोटे से ब्लौग को भी सेव कर लिया, कहीं उन आयोग वाली महिलाओं को टी.वी. पर आने की तकलीफ न उठानी पड़े. कहीं मेरा प्यारा सा दोस्त तबाह न हो जाए....

...बहुत दिन तक वह रात से ले कर सुबह तक का सफ़र मुझे डराता रहा, अपने खौफनाक संभावित नतीजों से, पर मैं पल पल बहुत लंबे अरसे तक सुख की सांस लेती रही, यही मेरी खुशकिस्मती थी. यही मेरा निजी जीवन.
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